यूनेस्को से मान्यता प्राप्त ठठेरा शिल्प के संरक्षण के लिए ऑस्ट्रेलियाई कलाकार और पंजाब के शिल्पकार ने लगाई प्रदर्शनी
नई दिल्ली, 13 जुलाई (आईएएनएस)। एक ऑस्ट्रेलियाई कलाकार और भारत के एक मास्टर ताम्र शिल्पकार ने सदियों पुरानी धातु शिल्प परंपरा का जश्न मनाने के लिए संयुक्त रूप से एक प्रदर्शनी आयोजित की है। यह प्रदर्शनी भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मजबूत होते सांस्कृतिक संबंधों को भी रेखांकित करती है।
'एनालॉग एंड अल्केमी' प्रदर्शनी में ऑस्ट्रेलियाई कलाकार एलियट बैस्टियानॉन और पंजाब के मास्टर ताम्र शिल्पकार हरि कृष्ण एक साथ आए हैं। इस प्रदर्शनी में आधुनिक मूर्तिकला और यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त 'ठठेरा' धातु शिल्प परंपरा का अनोखा संगम देखने को मिलता है। ठठेरा शिल्प में हाथ से तांबे और पीतल के बर्तन बनाए जाते हैं।
नई दिल्ली में रहने वाले ऑस्ट्रेलियाई कलाकार एलियट बैस्टियानॉन धातु से अनोखी कलाकृतियां बनाने के लिए जाने जाते हैं। वह एक जैसी धातु की कई आकृतियों को जोड़कर दीवार पर लगाने वाली और स्वतंत्र रूप से खड़ी रहने वाली मूर्तियां तैयार करते हैं। इसके बाद विशेष इलेक्ट्रोप्लेटिंग तकनीक से उन्हें चट्टानों जैसी मजबूत और आकर्षक बनावट देते हैं।
इस प्रदर्शनी में वह हरि कृष्ण के साथ काम कर रहे हैं। हरि कृष्ण के परिवार में तांबे और पीतल के बर्तन हाथ से बनाने की यह पारंपरिक कला 200 साल से भी अधिक समय से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है।
यह साझेदारी दिखाती है कि कैसे पारंपरिक कला और नई सोच मिलकर नई कलात्मक अभिव्यक्तियों को जन्म दे सकती हैं। साथ ही, इससे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही पारंपरिक शिल्प कला को भी बचाने में मदद मिलती है।
यह प्रदर्शनी भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मजबूत होते सांस्कृतिक रिश्तों का भी उदाहरण है। इससे यह संदेश मिलता है कि दोनों देशों के कलाकार मिलकर सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के साथ-साथ आधुनिक कला को भी नई दिशा दे सकते हैं।
भारत में ऑस्ट्रेलियाई उच्चायोग ने इंस्टाग्राम पर लिखा, "नवाचार तब सबसे बेहतर होता है जब परंपरा और आधुनिकता साथ आते हैं। ऑस्ट्रेलियाई कलाकार एलियट बैस्टियानॉन और पंजाब के मास्टर ताम्र शिल्पकार हरि कृष्ण ने 'एनालॉग एंड अल्केमी' प्रदर्शनी के जरिए आधुनिक मूर्तिकला और यूनेस्को से मान्यता प्राप्त ठठेरा शिल्प को एक साथ प्रस्तुत किया है।"
उच्चायोग ने कहा, "यह साझेदारी सिर्फ खूबसूरत कलाकृतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर भारत की पीढ़ियों से चली आ रही दुर्लभ धातु शिल्प परंपरा को भी संरक्षण देती है। यह अंतरराष्ट्रीय रचनात्मक सहयोग का बेहतरीन उदाहरण है, जो सांस्कृतिक विरासत को बचाने के साथ नई कलात्मक संभावनाओं को भी बढ़ावा देता है और भारत-ऑस्ट्रेलिया के मजबूत होते सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाता है।"
यूनेस्को के अनुसार, पंजाब के जंडियाला गुरु के ठठेरा समुदाय की पारंपरिक कला तांबे और पीतल के बर्तन बनाने की विशेष तकनीक है। इसमें इस्तेमाल होने वाले तांबे, पीतल और अन्य मिश्र धातुओं को स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।
--आईएएनएस
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