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असीम मुनीर की तेहरान यात्रा से पाकिस्तान की कूटनीतिक मुश्किलें उजागर

असीम मुनीर की तेहरान यात्रा से पाकिस्तान की कूटनीतिक मुश्किलें उजागर
असीम मुनीर की तेहरान यात्रा से पाकिस्तान की कूटनीतिक मुश्किलें उजागर

नई दिल्ली, 1 नवंबर (आईएएनएस)। मध्य पूर्व में खुद को मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की पाकिस्तान की कोशिशों के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। ईरान के साथ बढ़ता तनाव, सऊदी अरब के साथ गहराता रक्षा सहयोग और अमेरिका के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखने की जरूरत ने इस्लामाबाद के लिए कूटनीतिक संतुलन कायम करना मुश्किल बना दिया है। एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।

'डायरेक्टस' पोर्टल पर प्रकाशित रिपोर्ट 'पाकिस्तान्स डेंजरस डबल गेम: असीम मुनीर टेहरान विजिट एक्सपोजेज ग्रोइंग टेंशंस विद ईरान, सऊदी अरब एंड द यूनाइटेड स्टेट्स' में इस्लामाबाद की कूटनीतिक कोशिशों और उसके सुरक्षा एवं आर्थिक फैसलों के बीच विरोधाभासों का विश्लेषण किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर 20 अक्टूबर को तेहरान पहुंचे थे। उनकी इस यात्रा का उद्देश्य मध्य पूर्व में बढ़ती अस्थिरता के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका को मजबूत करना था। हालांकि, यह यात्रा ऐसे समय हुई जब पाकिस्तान और ईरान के बीच प्रमुख सीमा चौकियों पर आवाजाही बाधित होने से दोनों देशों के बीच व्यापार प्रभावित हो रहा था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि तफ्तान और गबद-रिमदान सीमा चौकियों पर परिचालन निलंबित होने से करीब 2,000 ट्रक फंस गए थे। इससे सीमा पार व्यापार प्रभावित हुआ और दोनों देशों के कारोबारियों के बीच अनिश्चितता बढ़ गई। इस्लामाबाद ने सीमा पर सुरक्षा चिंताओं, तस्करी और सीमा प्रबंधन की जरूरतों को प्रतिबंधों की वजह बताया, जबकि ईरानी अधिकारियों ने इस व्यवधान को अस्थायी तकनीकी या एहतियाती कदम बताया।

रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी पक्ष की ओर से राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ मुनीर की बातचीत के संबंध में दी गई जानकारी में कहा गया कि पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख ने सीमा से जुड़ी समस्याओं के समाधान और वाणिज्यिक आवाजाही बहाल होने की बात कही थी।

रिपोर्ट में पाकिस्तान और ईरान के बीच जमीनी व्यापार मार्गों के आर्थिक महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है। ईरान के समुद्री व्यापार पर बढ़ती पाबंदियों के बीच आवश्यक वस्तुओं की आवाजाही के लिए वैकल्पिक मार्गों की अहमियत बढ़ गई है। हालांकि, जमीनी रास्ते बड़े समुद्री बंदरगाहों की जगह नहीं ले सकते, लेकिन वे व्यापार का अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराते हैं और स्थानीय कारोबार को समर्थन देते हैं।

पाकिस्तान ने पहले निर्धारित सीमा चौकियों के माध्यम से तीसरे देशों के सामान को ईरान तक पहुंचाने की अनुमति दी थी। लेकिन बाद में सीमा पर आवाजाही रोकने से यह स्पष्ट हुआ कि सुरक्षा और राजनीतिक फैसलों के कारण ऐसी व्यापारिक व्यवस्थाएं कितनी प्रभावित हो सकती हैं।

रिपोर्ट में प्रतिबंधों को लेकर पाकिस्तान के रुख पर भी सवाल उठाए गए हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कथित तौर पर कहा था कि इस्लामाबाद लागू प्रतिबंध व्यवस्था का पालन करेगा, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि वह किन प्रतिबंधों का पालन करेगा। रिपोर्ट के अनुसार, इस अस्पष्टता से सीमा पार कारोबार करने वाले व्यापारियों और परिवहन कंपनियों के लिए वित्तीय जोखिम बढ़ सकते हैं।

रिपोर्ट में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते रक्षा संबंधों को भी इस्लामाबाद की कूटनीतिक चुनौतियों की एक प्रमुख वजह बताया गया है। इसके मुताबिक, यमन में हूती हमलों के तेज होने के बीच 5 अक्टूबर को पाकिस्तान और सऊदी अरब से जुड़े रक्षा समझौते को सक्रिय किया गया। इससे पाकिस्तान की रियाद के सुरक्षा ढांचे में भूमिका और अधिक स्पष्ट हो गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मुनीर की तेहरान यात्रा से एक दिन पहले पाकिस्तानी सेना ने सऊदी अरब के राजदूत के साथ रक्षा सहयोग और रणनीतिक समन्वय मजबूत करने को लेकर हुई बातचीत की जानकारी सार्वजनिक की थी। हालांकि, इस्लामाबाद का कहना है कि सऊदी अरब में तैनात पाकिस्तानी सैन्यकर्मी रक्षात्मक जिम्मेदारियां निभा रहे हैं और यमन में सैन्य अभियानों में हिस्सा नहीं लेंगे। इसके बावजूद पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग ईरान की चिंताएं बढ़ा सकता है।

रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन घटनाक्रमों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अमेरिका ने पाकिस्तान को सीमा चौकियां बंद करने का निर्देश दिया था। उपलब्ध घटनाक्रम इस तरह के किसी संबंध को प्रमाणित नहीं करते।

मुनीर की कूटनीतिक पहल के बीच ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत को लेकर अपना सख्त रुख बरकरार रखा है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी अधिकारियों ने दोहराया कि तेहरान की मांगों पर प्रगति के बिना वाशिंगटन के साथ बातचीत दोबारा शुरू नहीं होगी। इन मांगों में नाकेबंदी समाप्त करना, तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों से राहत देना और क्षेत्रीय शत्रुता रोकना शामिल है। ईरान के सुरक्षा अधिकारी मोहसेन रजाई ने भी कथित तौर पर कहा कि देश की समृद्ध परमाणु सामग्री ईरान की धरती पर ही रहेगी।

रिपोर्ट में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की सुरक्षा स्थिति को भी ईरान के साथ संबंधों का एक महत्वपूर्ण पहलू बताया गया है। इस क्षेत्र में लंबे समय से राष्ट्रवादी उग्रवाद जारी है, जबकि ईरानी सुरक्षा बलों को भी सीमा के आसपास सक्रिय सशस्त्र समूहों का सामना करना पड़ा है। जनवरी 2024 में पाकिस्तान और ईरान की ओर से एक-दूसरे के क्षेत्र में किए गए जवाबी हमलों का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट ने कहा कि सीमा पर सुरक्षा तनाव कितनी तेजी से सैन्य टकराव में बदल सकता है।

सीमा पार व्यापार में रुकावट का सीधा असर आम लोगों और कारोबारियों पर पड़ता है। विशेष रूप से ट्रक चालकों और उन व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ता है, जो दोनों देशों के बीच सामान की आवाजाही पर निर्भर हैं। सीमा पर फंसे वाहन, खराब होती जल्दी नष्ट होने वाली वस्तुएं, परिवहन लागत में वृद्धि और व्यापारिक अवसरों का नुकसान इसके तत्काल प्रभाव हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सामने एक साथ कई मोर्चों पर संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। उसे ईरान का भरोसा कायम रखना है, सऊदी अरब के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाना है और अमेरिका के साथ कामकाजी संबंध भी बनाए रखने हैं। इसके साथ ही क्षेत्रीय व्यापार को भी सुचारू और भरोसेमंद बनाना होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये सभी उद्देश्य एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं, लेकिन इन्हें हासिल करने के लिए पाकिस्तान की नीतियों में निरंतरता और पारदर्शिता जरूरी है।

तफ्तान और गबद-रिमदान सीमा चौकियों को दोबारा खोलना जरूरी कदम बताया गया है, लेकिन रिपोर्ट ने आगाह किया है कि दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करना इससे कहीं अधिक कठिन होगा। रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि एक कूटनीतिक मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की विश्वसनीयता केवल प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच बातचीत कराने की क्षमता पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि व्यापार, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय रक्षा से जुड़े उसके फैसले उसकी कूटनीतिक प्रतिबद्धताओं के अनुरूप हैं या नहीं।

--आईएएनएस

डीएससी

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