महिलाओं की आजादी पर सवाल क्यों? अल्पना बुच ने समाज के दोहरे रवैये पर उठाए सवाल
मुंबई, 12 अगस्त (आईएएनएस)। महिलाओं की आजादी, उनके कपड़े, उनकी जीवनशैली और निजी फैसलों को लेकर समाज में लंबे समय से बहस होती रही है, लेकिन आज के दौर में महिलाएं अपने फैसले खुद लेना पसंद करती है। इसके लिए उन्हें कई बार लोगों के सवालों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। इस मुद्दे पर लोकप्रिय सीरियल 'अनुपमा' में लीला बा का किरदार निभाने वाली अल्पना बुच ने अपनी राय रखी और कहा कि महिलाओं के निजी फैसलों को उनके चरित्र से जोड़ना बंद किया जाना चाहिए।
आईएएनएस से बात करते हुए अल्पना बुच ने कहा, ''महिलाओं को आज भी उनकी पसंद के आधार पर आसानी से परखा जाता है। कोई महिला छोटे कपड़े पहनती है, देर रात घर से बाहर रहती है, किसी खास उम्र में शादी नहीं करना चाहती या आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखती है, तो समाज के कुछ लोग तुरंत उसके चरित्र और सोच पर सवाल उठाने लगते हैं। असली समस्या कपड़ों या जीवनशैली में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो महिला की पसंद को उसकी स्वतंत्रता के खिलाफ इस्तेमाल करने लगती है।''
अल्पना ने कहा, ''कई बार कपड़े केवल एक बहाना बन जाते हैं। लोग महिला के कपड़ों को आधार बनाकर यह तय करने की कोशिश करते हैं कि उसे किस तरह की जिंदगी जीनी चाहिए। किसी महिला की पसंद पर सवाल उठाना बंद होना चाहिए। जब तक परिवार, दोस्त और साथ काम करने वाले लोग महिलाओं के फैसलों को समझने और उनका सम्मान करने की कोशिश नहीं करेंगे, तब तक समाज में सही बदलाव नहीं आ सकता।''
अल्पना ने कहा, ''महिलाओं की आजादी को गलत या विद्रोही नजरिए से देखने की जरूरत नहीं है। अगर कोई महिला अपने तरीके से जिंदगी जीना चाहती है, तो इस पर उसे जिद्दी या विद्रोही कह देना सही नहीं है। स्वतंत्रता का मतलब किसी के खिलाफ जाना नहीं है, बल्कि अपनी जिंदगी के बारे में फैसले लेने का अधिकार होता है।''
अल्पना ने टीवी की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने कहा, ''टीवी शोज समाज की सोच को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं। इसलिए पर्दे पर ऐसी महिलाओं को सामान्य रूप में दिखाया जाना चाहिए जो अपने फैसले खुद लेती हैं। अगर स्वतंत्र महिला किरदारों को सहज और सामान्य तरीके से पेश किया जाए, तो इससे समाज की सोच में भी बदलाव आ सकता है।''
अल्पना ने महिलाओं की अलग-अलग पीढ़ियों के बीच सोच के अंतर पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा, ''हर पीढ़ी के लिए आजादी का मतलब अलग हो सकता है। बड़ी उम्र की महिलाओं ने अपने जीवन में कई तरह की मुश्किलें देखी हैं और उनका आत्मविश्वास उन अनुभवों से आता है। वहीं युवा महिलाएं सवाल पूछने और पुरानी सीमाओं को चुनौती देने में ज्यादा सहज हैं। दोनों पीढ़ियों की ताकत अलग है और किसी एक को सही या दूसरी को गलत कहना उचित नहीं होगा।''
उन्होंने आगे कहा, ''अगर महिलाएं एक-दूसरे के फैसलों की तुलना करने के बजाय उनकी बात सुनें, तो दोनों पीढ़ियां एक-दूसरे से काफी कुछ सीख सकती हैं। मेरा मानना है कि उम्र और अनुभव का अंतर महिलाओं के बीच दूरी बनाने की वजह नहीं होना चाहिए। इसके बजाय यही अंतर एक-दूसरे को समझने का जरिया बन सकता है।
--आईएएनएस
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