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एएफटी ने समलैंगिक आईएएफ कर्मी की बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में बदला

एएफटी ने समलैंगिक आईएएफ कर्मी की बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में बदला
एएफटी ने समलैंगिक आईएएफ कर्मी की बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में बदला

कोलकाता, 31 अगस्त (आईएएनएस)। नई दिल्ली में आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (एएफटी) की प्रिंसिपल बेंच ने एक डिफेंस कर्मचारी, जिसने खुद के 'गे' होने की बात मानी थी, को नौकरी से बर्खास्त करने के आदेश को 'रूटीन डिस्चार्ज' में बदल दिया है।

यह फैसला बेंच के चेयरमैन जस्टिस राजेंद्र मेनन और जस्टिस रासिका चौबे ने लिया। जिस व्यक्ति ने अर्जी दी थी (उसकी पहचान छिपाने के लिए उसका नाम या पद नहीं बताया गया है), उसने दिसंबर 2016 में इंडियन एयरफोर्स (आईएएफ) जॉइन किया था। 2024 में उसने मानवीय आधार पर नौकरी छोड़ने (डिस्चार्ज) की मांग की और माना कि आईएएफ परिसर के बाहर उसका एक विदेशी पार्टनर के साथ समलैंगिक संबंध था।

आईएएफ की जांच में यह नतीजा निकला कि उसने एक विदेशी के साथ संबंध बनाकर अनुशासन तोड़ा और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला। कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी ने उसे बिना इजाजत विदेश यात्रा करने का भी दोषी पाया। इसके बाद इस साल की शुरुआत में उसे नौकरी से निकाल दिया गया।

उस व्यक्ति ने नौकरी से निकाले जाने के फैसले को चुनौती नहीं दी, लेकिन एएफटी से गुजारिश की कि इसे 'डिस्चार्ज' में बदल दिया जाए ताकि भविष्य में नौकरी मिलने की संभावनाओं पर असर न पड़े।

एएफटी ने कहा, "भले ही, जैसा कि प्रतिवादियों (आईएएफ) का तर्क है, जब कोई कर्मचारी संघ के अनुशासित सशस्त्र बल में काम करता है, तो अनुशासन और नैतिकता के कुछ मानक लागू होते हैं, और प्रतिवादी अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकते हैं। हालांकि, इस मामले में प्रतिवादियों ने कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया और उनके द्वारा की गई तथाकथित पूछताछ और जांच में भी, जैसा कि 'स्पीकिंग ऑर्डर' और उपलब्ध अन्य सामग्री से स्पष्ट है, राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की रक्षा या इंडियन एयरफोर्स के कामकाज से जुड़ी कोई चिंताजनक बात नहीं दिखी।"

ट्रिब्यूनल ने गौर किया कि उस व्यक्ति ने माना था कि उसने सही प्रक्रिया का पालन किए बिना अपने पार्टनर के साथ रहने के लिए दो बार थाईलैंड और श्रीलंका की यात्रा की थी। उसके वकील ने तर्क दिया कि उसकी कोई बुरी नीयत नहीं थी, बल्कि हालात के कारण उसे ऐसा करना पड़ा।

एएफटी ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में अगर नौकरी से निकाले जाने को चुनौती दी जाती तो वह उसे सही ठहराता। फिर भी, उस व्यक्ति ने केवल मानवीय आधार पर डिस्चार्ज की मांग की थी, इसलिए ट्रिब्यूनल ने उसकी अर्जी पर विचार किया। उसने लगभग साढ़े दस साल तक सेवा की है, जो पेंशन या रिटायरमेंट के बाद के लाभ पाने के लिए काफी नहीं है। उसके वकील ने कहा कि वह पैसे से जुड़े लाभ नहीं चाहता, बल्कि केवल सम्मानजनक डिस्चार्ज चाहता है ताकि वह अपने पार्टनर के साथ बस सके और दूसरे काम कर सके।

बेंच ने माना कि नियमों का उल्लंघन होने पर नौकरी से निकालना सही है, लेकिन इस मामले में अपवादों पर भी विचार किया जाना चाहिए। आदेश में कहा गया, "प्रतिवादी आवेदक को 'डिस्चार्ज' (सेवा से मुक्त) कर सकते थे, लेकिन अनुशासन बनाए रखने के नाम पर उन्होंने उसे 'बर्खास्त' कर दिया। दोनों का नतीजा एक ही है क्योंकि प्रतिवादी आवेदक की सेवा नहीं चाहते हैं, इसलिए वे उसे बर्खास्तगी के तौर पर भारतीय वायुसेना की सूची से हटा रहे हैं।"

ट्रिब्यूनल ने फैसला सुनाया कि 'डिस्चार्ज' होने से उसे बर्खास्तगी से जुड़े कलंक से मुक्ति मिलेगी और उसके भविष्य के करियर की संभावनाओं में मदद मिलेगी। ट्रिब्यूनल ने बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में बदलने का निर्देश दिया और स्पष्ट किया कि आवेदक किसी भी तरह के आर्थिक लाभ, पेंशन, रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभ या पूर्व-सैनिक का दर्जा पाने का हकदार नहीं होगा।

एएफटी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले को दूसरे मामलों के लिए नजीर के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

--आईएएनएस

एससीएच/डीकेपी

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