दिल्ली हाईकोर्ट के जज तेजस कारिया ने केजरीवाल के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई से खुद को किया अलग
नई दिल्ली, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। दिल्ली हाईकोर्ट के जज तेजस कारिया ने बुधवार को आम आदमी पार्टी (आप) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल समेत अन्य राजनीतिक दलों के सदस्यों के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। यह याचिका उन पर कथित तौर पर आबकारी नीति मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा दायर एक 'रिक्यूज़ल प्ली' (सुनवाई से हटने की अर्जी) की सुनवाई के दौरान कोर्ट की कार्यवाही की ऑडियो और वीडियो क्लिप रिकॉर्ड करने और उन्हें प्रसारित करने का आरोप लगाते हुए दायर की गई थी। यह मामला बुधवार को मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायाधीश तेजस कारिया की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था।
जस्टिस तेजस कारिया के मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लेने के बाद चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने निर्देश दिया कि वकील वैभव सिंह द्वारा दायर पीआईएल को सुनवाई के लिए गुरुवार को एक दूसरी बेंच के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि 13 अप्रैल को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने हुई कोर्ट की कार्यवाही के ऑडियो और वीडियो क्लिप "जानबूझकर और सोची-समझी रणनीति के तहत और कोर्ट की छवि खराब करने और आम जनता को गुमराह करने के इरादे से" बनाए और फैलाए गए थे। याचिका के अनुसार, केजरीवाल को दिल्ली हाईकोर्ट से अनुमति मिलने के बाद व्यक्तिगत रूप से पेश होने का मौका मिला था। इस दौरान उन्होंने लगभग 45-50 मिनट तक अपनी खुद को अलग करने वाली अर्जी पर बहस की, जिसके बाद कार्यवाही की रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़े पैमाने पर फैलाई गई।
याचिका में कहा गया है कि जिन परिस्थितियों में अदालत की कार्यवाही की ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग की गई, उसे विभिन्न राजनीतिक नेताओं द्वारा शेयर और पोस्ट किया गया। इससे अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के विभिन्न नेताओं की एक गहरी साजिश नजर आती है। साजिश का मकसद इस प्रतिष्ठित संस्था की छवि खराब करना और इस देश के आम लोगों को गुमराह करना है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि कई राजनीतिक नेताओं ने ऑनलाइन इस वीडियो को और ज़्यादा फैलाया। साथ ही, केजरीवाल का समर्थन करते हुए टिप्पणियां कीं और जस्टिस शर्मा पर सवाल उठाए।
याचिका में विशेष रूप से कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के पोस्ट का ज़िक्र किया गया है, जिन्होंने केजरीवाल की दलीलों को "बहुत साहसी" बताया और जस्टिस शर्मा से खुद को इस मामले से अलग करने का सुझाव दिया। यह एक ऐसा सोशल मीडिया पोस्ट था, जिसे केजरीवाल ने भी रीपोस्ट किया था।
याचिका में आप नेता सौरभ भारद्वाज, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और अन्य के पोस्ट का भी ज़िक्र किया गया है। आरोप लगाया गया है कि अदालत की कार्यवाही को "गुमराह करने वाली टिप्पणियों" के साथ शेयर किया गया, ताकि जनता की राय को प्रभावित किया जा सके।
यह तर्क देते हुए कि ऐसे काम "दिल्ली हाईकोर्ट के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2021" और "इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025" का उल्लंघन करते हैं।
याचिकाकर्ता ने नियमों का हवाला देते हुए कहा, "जब तक अदालत द्वारा स्पष्ट रूप से अनुमति न दी जाए, कोई भी व्यक्ति कार्यवाही को रिकॉर्ड या प्रकाशित नहीं कर सकता है। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा कार्यवाही की कोई भी अनधिकृत रिकॉर्डिंग नहीं की जाएगी। आप द्वारा कार्यवाही का वीडियो बनाना और शेयर करना दिल्ली हाईकोर्ट के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2021 और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025" का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि सामग्री को हटाने की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट रजिस्ट्री और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को शिकायतें भेजी गई थीं, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है। जिसके कारण यह जनहित याचिका दायर करना जरूरी हो गया।
यह घटनाक्रम दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई के बीच सामने आया है, जिसे केंद्रीय जांच ब्यूरो ने दायर किया है। इस याचिका में सीबीआई ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें अब रद्द हो चुकी दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में केजरीवाल और सिसोदिया सहित सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
9 मार्च को न्यायमूर्ति शर्मा की एकल-न्यायाधीश की पीठ ने सीबीआई की याचिका पर आरोपियों को नोटिस जारी किया था और निचली अदालत द्वारा दिए गए कुछ निर्देशों पर रोक लगा दी थी, जिसमें जांच एजेंसी के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियां भी शामिल थीं। इसके बाद जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल की उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने जस्टिस शर्मा से खुद को इस मामले से अलग करने की मांग की थी। जस्टिस शर्मा ने कहा कि पक्षपात के आरोप "महज आशंका या निजी सोच" पर आधारित थे और उनके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं था।
जज ने चेतावनी देते हुए कहा, "खुद को अलग करने के अधिकार का इस्तेमाल न तो अपनी पसंद की बेंच चुनने के लिए किया जा सकता है और न ही यह धारणा बनाने के लिए कि न्याय को प्रभावित किया जा सकता है। "अदालत कोई नाटक का मंच नहीं हो सकती।"
पक्षपात के आरोपों को "अटकलें और इशारेबाजी" बताते हुए खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि यह अर्जी "मेरी ईमानदारी पर लांछन और संदेह पैदा करने के इरादे से लाई गई थी लेकिन इसके साथ कोई ठोस सबूत नहीं था।
दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने भी प्रशासनिक स्तर पर केजरीवाल की उस मांग को ठुकरा दिया जिसमें उन्होंने इस मामले को जस्टिस शर्मा की बेंच से किसी दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने की गुजारिश की थी।
चीफ जस्टिस ने कहा कि यह मामला रोस्टर (कार्य सूची) के अनुसार ही इस बेंच को सौंपा गया था, इसलिए इसे दोबारा किसी और बेंच को सौंपने का कोई कारण नहीं बनता। केजरीवाल ने यह आशंका जताई थी कि अगर यह मामला इसी बेंच के पास रहा तो शायद उन्हें निष्पक्ष सुनवाई न मिल पाए।
इससे पहले वरिष्ठ वकीलों, शिक्षाविदों, पूर्व पुलिस अधिकारियों और बार एसोसिएशन के सदस्यों के एक समूह ने भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत को एक पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के एक मौजूदा जज पर केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरोपों पर चिंता जताई थी और इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई शुरू करने की मांग की थी।
--आईएएनएस
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