1984 सिख विरोधी दंगों के मुकदमे संस्थागत धोखाधड़ी की तरह चलाए गए: पूर्व न्यायाधीश
चंडीगढ़, 6 नवंबर (आईएएनएस)। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति शिव नारायण ढींगरा ने 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों की सुनवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आपराधिक न्याय व्यवस्था को चार दशकों तक व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया और प्रभावशाली राजनीतिक संरक्षकों को बचाने के लिए मुकदमों को संस्थागत 'धोखाधड़ी' की तरह चलाया गया।
न्यायमूर्ति ढींगरा ने इस सप्ताह चंडीगढ़ में भाजपा के 'जख्म 84 दे' सम्मेलन के दौरान 'मर्डर ऑफ जस्टिस' (न्याय की हत्या) सत्र को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की। उन्होंने 2018 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) का नेतृत्व भी किया था। उन्होंने बताया कि किस तरह पुलिस तंत्र, कानूनी प्रक्रियाओं की तकनीकी पेचीदगियों और राजनीतिक संरक्षण ने मिलकर दोषियों की जवाबदेही तय होने से रोकने का काम किया।
न्यायमूर्ति ढींगरा ने कहा, "कोई दंगा अपने आप नहीं होता। हर सांप्रदायिक दंगे को प्रबंधित किया जाता है और उसे संरक्षण दिया जाता है।" उन्होंने कहा कि 1984 में पुनर्वास कॉलोनियों से भीड़ जुटाई गई, उन्हें हथियार दिए गए और सिख परिवारों के घरों को निशाना बनाने के लिए विशेष सूचियां सौंपी गईं। इसके बाद अदालतों में जो कुछ हुआ, वह न्याय का मजाक था।
उन्होंने सवाल उठाया, "जब हमारी न्याय वितरण प्रणाली में दोषसिद्धि की दर महज छह प्रतिशत है, तो क्या दो दशक बाद किसी आरोपी का बरी होना न्याय कहलाएगा? अगर अदालत के सामने लाए गए आरोपियों ने हत्या नहीं की, तो फिर हत्या किसने की? यह पता लगाने की जिम्मेदारी राज्य की थी, लेकिन पूरी व्यवस्था ने इस सवाल से मुंह मोड़ लिया।"
कड़कड़डूमा विशेष अदालत में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के रूप में पूर्वी दिल्ली के दंगा मामलों की सुनवाई के अपने अनुभव साझा करते हुए न्यायमूर्ति ढींगरा ने तत्कालीन प्रशासन पर प्रक्रियागत बाधाएं खड़ी करने का आरोप लगाया।
उन्होंने त्रिलोकपुरी नरसंहार का उल्लेख करते हुए बताया कि पुलिस ने 200 से अधिक अलग-अलग हत्याओं को एक ही प्राथमिकी (एफआईआर) में शामिल कर दिया था। जबकि आपराधिक प्रक्रिया कानून के तहत तीन से अधिक अपराधों की एक साथ सुनवाई नहीं की जा सकती थी। इसके बावजूद अभियोजन पक्ष ने मामलों को अलग करने के लिए दाखिल आवेदन को वर्षों तक लंबित रहने दिया।
न्यायमूर्ति ढींगरा ने बताया कि उन्होंने लंबित आवेदन को दोबारा सामने लाकर प्रत्येक हत्या के लिए अलग आरोपपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके बाद मामले को 200 अलग-अलग मुकदमों में बांटा गया। इस प्रक्रिया में एचकेएल भगत जैसे प्रमुख राजनीतिक नेताओं और स्थानीय पार्षदों को भी मुकदमे का सामना करना पड़ा।
उन्होंने आरोप लगाया कि 1984 से 1992 के बीच लगातार अलग-अलग जांच आयोगों का गठन किया गया, ताकि औपचारिक आपराधिक मामले दर्ज होने से रोके जा सकें।
न्यायमूर्ति ढींगरा के अनुसार, आयोगों की सिफारिशों के आधार पर जब आठ साल बाद एफआईआर दर्ज की गईं, तो राज्य के वकीलों ने निचली अदालतों में आरोपियों को बरी कराने के लिए आठ साल की देरी को ही मुख्य आधार बना लिया। उन्होंने इस देरी को 'बिना स्पष्टीकरण के हुई देरी' बताकर बचाव पक्ष की दलीलों को मजबूती देने का आरोप लगाया।
उन्होंने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार की गिरफ्तारी के लिए सीबीआई की एक कोशिश का भी जिक्र किया। न्यायमूर्ति ढींगरा ने बताया कि सुबह सात बजे गिरफ्तारी के लिए पहुंची सीबीआई की टीम को उनके आवास के बाहर इंतजार करना पड़ा। महज 15 मिनट के भीतर वहां भीड़ जमा हो गई और उसने आवास को घेर लिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस ने न तो हस्तक्षेप किया और न ही केंद्रीय एजेंसी की मदद की। इस बीच, सज्जन कुमार के वकीलों ने दोपहर से पहले ही अग्रिम जमानत हासिल कर ली। न्यायमूर्ति ढींगरा ने यह भी बताया कि बाद में सीबीआई ने अदालत के रिकॉर्ड पर एक हलफनामा दाखिल किया था, जिसमें खुलासा किया गया कि पुलिस की आधिकारिक केस फाइल सज्जन कुमार के बचाव पक्ष के वकील के भौतिक कब्जे में पहुंच गई थी।
--आईएएनएस
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