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जेल में रौब चाहिए था, इसलिए बन गया सीरियल किलर! ‘कनपट्टीमार’ शंकरिया की खौफनाक कहानी

जेल में रौब चाहिए था, इसलिए बन गया सीरियल किलर! ‘कनपट्टीमार’ शंकरिया की खौफनाक कहानी

राजस्थान के अपराध इतिहास में एक ऐसा नाम भी दर्ज है, जिसकी कहानी सुनकर आज भी लोग सिहर उठते हैं। नाम था कनपट्टीमार शंकरिया। बेहद कम उम्र में अपराध की दुनिया में कदम रखने वाला यह शख्स आगे चलकर हत्या की वारदातों के कारण कुख्यात हो गया। उसके अपराध करने का कथित तरीका इतना खौफनाक था कि लोग उसे ‘कनपट्टीमार’ के नाम से जानने लगे।

उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक शंकरिया का जन्म 1952 में जयपुर में हुआ था। 1977 से 1978 के बीच उसकी आपराधिक गतिविधियों ने पुलिस और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी थी। उसके ऊपर कई हत्याओं के मामले सामने आए। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि पूछताछ के दौरान उसने 70 से अधिक लोगों की हत्या करने की बात कही थी। हालांकि, इस संख्या को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं और सभी हत्याओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

कैसे बना ‘कनपट्टीमार’?

शंकरिया की पहचान उसके कथित हत्या करने के तरीके से बनी। रिपोर्टों में बताया गया है कि वह अपने शिकार पर अचानक हमला करता था और सिर या कनपटी के आसपास हथौड़े से वार करता था। इसी वजह से अपराध की दुनिया में उसका नाम ‘कनपट्टीमार’ पड़ गया।

उस दौर में आधुनिक फोरेंसिक तकनीक और आज जैसी जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। लगातार सामने आती वारदातों ने पुलिस के सामने चुनौती खड़ी कर दी। जैसे-जैसे मामले जुड़ते गए, पुलिस ने संदिग्धों की गतिविधियों और पुराने मामलों की कड़ियों को खंगालना शुरू किया।

जेल में रौब जमाने की कहानी कितनी सच?

शंकरिया की कहानी से जुड़े कुछ लोकप्रिय विवरणों में यह दावा किया जाता है कि जेल में दबदबा और रौब कायम करने की चाहत ने उसके अपराधी व्यक्तित्व को और बढ़ावा दिया। हालांकि, उसके अपराधों के पीछे यही निश्चित कारण था, ऐसा आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर कहना मुश्किल है।

किसी अपराधी की मानसिकता को समझने के लिए उसके व्यक्तिगत इतिहास, परिस्थितियों और अदालत या जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड को देखना जरूरी होता है। इसलिए ‘जेल में रौब चाहिए था, इसलिए सीरियल किलर बना’ वाली बात को कहानी के लोकप्रिय दावे के रूप में देखना चाहिए, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।

पुलिस के शिकंजे में कैसे आया?

लगातार हत्याओं के बाद पुलिस ने शंकरिया की तलाश तेज कर दी। जांच और पूछताछ के बाद उसे गिरफ्तार किया गया। उसके खिलाफ हत्या के मामले में मुकदमा चला और अदालत ने उसे मौत की सजा सुनाई।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 16 मई 1979 को जयपुर में शंकरिया को फांसी दी गई थी। उस समय उसकी उम्र करीब 27 वर्ष थी।

आखिरी वक्त में जताया था पछतावा?

शंकरिया के आखिरी समय से जुड़ी एक बात भी अपराध इतिहास की चर्चाओं में मिलती है। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि फांसी से पहले उसने अपने किए अपराधों पर पछतावा जताया था और कहा था कि किसी को भी उसकी तरह नहीं बनना चाहिए। हालांकि, ऐसे कथनों की पुष्टि के लिए मूल ऐतिहासिक या आधिकारिक रिकॉर्ड को प्राथमिक स्रोत माना जाना चाहिए।

कनपट्टीमार शंकरिया की कहानी इसलिए भी चर्चा में रहती है क्योंकि अपराध का दौर अपेक्षाकृत छोटा होने के बावजूद उसका नाम राजस्थान के कुख्यात अपराधियों में शामिल हो गया। उसकी कहानी यह भी बताती है कि अपराध की दुनिया में बढ़ता कदम किस तरह इंसान को बेहद गंभीर और घातक अपराधों तक पहुंचा सकता है।

आज दशकों बाद भी ‘कनपट्टीमार’ नाम राजस्थान के पुराने अपराध मामलों की चर्चाओं में सुनाई देता है। हालांकि इस कहानी से जुड़े कई दावों में स्रोतों के बीच अंतर है, इसलिए हत्या की वास्तविक संख्या और अपराध के पीछे की वजहों को बताते समय प्रमाणित तथ्यों और लोकप्रिय किस्सों के बीच अंतर करना जरूरी है।

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