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हर व्यक्ति क्यों है अलग, आयुर्वेद से जानिए अपनी 'प्रकृति’ का रहस्य

नई दिल्ली, 13 मार्च (आईएएनएस)। आयुर्वेद मानता है कि हर इंसान जन्म के समय एक खास शारीरिक और मानसिक बनावट के साथ पैदा होता है, जिसे प्रकृति कहा जाता है। यह प्रकृति तीन मुख्य दोषों वात, पित्त और कफ के संतुलन से बनती है। इन दोषों का प्रभाव केवल हमारे शरीर पर ही नहीं बल्कि हमारी सोच, व्यवहार, ऊर्जा और बीमारियों की प्रवृत्ति पर भी पड़ता है।
हर व्यक्ति क्यों है अलग, आयुर्वेद से जानिए अपनी 'प्रकृति’ का रहस्य

नई दिल्ली, 13 मार्च (आईएएनएस)। आयुर्वेद मानता है कि हर इंसान जन्म के समय एक खास शारीरिक और मानसिक बनावट के साथ पैदा होता है, जिसे प्रकृति कहा जाता है। यह प्रकृति तीन मुख्य दोषों वात, पित्त और कफ के संतुलन से बनती है। इन दोषों का प्रभाव केवल हमारे शरीर पर ही नहीं बल्कि हमारी सोच, व्यवहार, ऊर्जा और बीमारियों की प्रवृत्ति पर भी पड़ता है।

आयुर्वेद के अनुसार किसी व्यक्ति की प्रकृति केवल उसके माता-पिता के जीन से ही नहीं बनती बल्कि गर्भावस्था के दौरान मां के खानपान, जीवनशैली और वातावरण से भी प्रभावित होती है। यही कारण है कि एक ही परिवार में पैदा हुए भाई-बहनों की प्रकृति भी अलग-अलग हो सकती है।

आयुर्वेद में मुख्य रूप से सात प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन किया गया है वातज, पित्तज, कफज, वात-पित्त, पित्त-कफ, वात-कफ और त्रिदोषज प्रकृति। इनमें से कुछ लोगों में एक दोष अधिक प्रभावी होता है जबकि कुछ में दो या तीन दोषों का मिश्रण पाया जाता है।

वात प्रकृति वाले लोग आमतौर पर दुबले-पतले होते हैं, उनकी त्वचा रूखी होती है और वे बहुत सक्रिय और जल्दी काम शुरू करने वाले होते हैं। वे जल्दी सीख लेते हैं, लेकिन कई बार चीजें जल्दी भूल भी जाते हैं।

पित्त प्रकृति के लोगों का शरीर गर्म रहता है, उन्हें जल्दी भूख और प्यास लगती है और वे तेज स्वभाव के होते हैं। इनमें नेतृत्व की क्षमता भी अक्सर ज्यादा होती है लेकिन इन्हें जल्दी गुस्सा भी आ सकता है।

वहीं कफ प्रकृति के लोग मजबूत शरीर वाले, शांत स्वभाव के और धैर्यवान होते हैं। उनकी त्वचा मुलायम होती है और वे धीरे-धीरे लेकिन स्थिर तरीके से काम करते हैं। प्रकृति का ज्ञान केवल व्यक्ति के स्वभाव को समझने के लिए ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है।

आयुर्वेद मानता है कि हर प्रकृति के लोगों में कुछ खास बीमारियों की संभावना अधिक होती है। जैसे वात प्रकृति वालों में जोड़ों का दर्द या ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी समस्याएं ज्यादा देखी जाती हैं, पित्त प्रकृति के लोग एसिडिटी, त्वचा रोग या खून से जुड़ी समस्याओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं, जबकि कफ प्रकृति के लोगों में मोटापा और सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा अधिक रहता है।

आयुर्वेद में कहा गया है कि जब व्यक्ति अपनी प्रकृति को समझकर उसी के अनुसार खान-पान, दिनचर्या और आदतें अपनाता है, तो वह कई बीमारियों से बच सकता है और एक स्वस्थ तथा संतुलित जीवन जी सकता है।

--आईएएनएस

पीआईएम/पीएम

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