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हनुमान जन्मोत्सव विशेष : ‘अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता’ हैं श्रीराम भक्त हनुमान, जानें दिव्य शक्ति का रहस्य

नई दिल्ली, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। चैत्र पूर्णिमा यानी गुरुवार 2 अप्रैल को भगवान श्रीरामचंद्र के परम भक्त हनुमान का जन्मोत्सव है। हनुमान जी त्रेतायुग में वानरराज केसरी और माता अंजना के यहां अवतरित हुए थे। धर्मशास्त्र के अनुसार हनुमान जी चिरंजीवी हैं और उनकी कृपा कलियुग में भी भक्तों पर बनी रहेगी।
हनुमान जन्मोत्सव विशेष : ‘अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता’ हैं श्रीराम भक्त हनुमान, जानें दिव्य शक्ति का रहस्य

नई दिल्ली, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। चैत्र पूर्णिमा यानी गुरुवार 2 अप्रैल को भगवान श्रीरामचंद्र के परम भक्त हनुमान का जन्मोत्सव है। हनुमान जी त्रेतायुग में वानरराज केसरी और माता अंजना के यहां अवतरित हुए थे। धर्मशास्त्र के अनुसार हनुमान जी चिरंजीवी हैं और उनकी कृपा कलियुग में भी भक्तों पर बनी रहेगी।

गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘हनुमान चालीसा’ हनुमान जी की भक्ति का सबसे सरल और शक्तिशाली माध्यम है। चालीसा की एक प्रसिद्ध चौपाई है “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस वर दीन जानकी माता”। अर्थात् माता सीता ने हनुमान जी को अष्ट सिद्धियां और नव निधियां देने का वरदान दिया था। हनुमान जी में इन शक्तियों को संभालने और उपयोग करने की अद्भुत क्षमता थी।

इन सिद्धियों की वजह से श्रीरामदूत किसी भी रूप में प्रकट हो सकते थे, पल भर में कहीं भी पहुंच सकते थे और असंभव कार्यों को भी संभव बना देते थे। हनुमान चालीसा के पाठ से भक्तों को इन दिव्य शक्तियों और संपत्तियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। संकट मोचन की कृपा से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं, साहस बढ़ता है और जीवन में सफलता मिलती है।

जानते हैं कि अष्ट सिद्धियां और नव निधियां क्या हैं? हनुमान जी के पास आठ दिव्य शक्तियां थीं, जिन्हें अष्ट सिद्धियां कहते हैं- अणिमा यानी बहुत सूक्ष्म रूप धारण करने की शक्ति। महिमा, इच्छानुसार बहुत बड़ा रूप धारण करने की शक्ति। गरिमा यानी शरीर को अत्यंत भारी बनाने की शक्ति। लघिमा यानी शरीर को अत्यंत हल्का बनाने की शक्ति। प्राप्ति या किसी भी वस्तु को तुरंत प्राप्त कर लेने की शक्ति। प्राकाम्य यानी इच्छानुसार किसी भी जगह पहुंचने, पानी में रहने या आकाश में उड़ने की शक्ति। सातवीं शक्ति है ईशित्व यानी दैवीय शक्तियों का नियंत्रण और आठवीं है वशित्व यानी इंद्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण।

वहीं, नव निधियां नौ प्रकार की दिव्य संपत्तियां हैं, जिन्हें पा लेने के बाद किसी अन्य धन-संपत्ति की जरुरत नहीं रहती। इनमें पद्म निधि या स्वर्ण-चांदी का संग्रह कर दान करने वाला सात्विक स्वभाव, महापद्म निधि धार्मिक कार्यों में धन लगाने वाला स्वभाव। नील निधि यानी तीन पीढ़ियों तक चलने वाली संपत्ति। मुकुंद निधि यानी राज्य और सत्ता से संबंधित संपत्ति है। नंद निधि यानी कुल का आधार बनने वाली संपत्ति। मकर निधि या अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह। कच्छप निधि में स्वयं उपभोग करने वाली संपत्ति है। वहीं, शंख निधि में एक पीढ़ी तक रहने वाली संपत्ति और खर्व निधि यानी मिश्रित फलों वाली संपत्ति है।

--आईएएनएस

एमटी/पीएम

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