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गुजरात वैकल्पिक ऊर्जा के इस्तेमाल में बन रहा आत्मनिर्भर, 250 छात्राओं का संस्थान बना बायोगैस का सफल मॉडल

गांधीनगर, 28 मार्च (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के दूरदर्शी नेतृत्व में गुजरात वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। पूरे राज्य में संस्थान खाना पकाने के लिए एक टिकाऊ ईंधन के तौर पर बायोगैस को तेजी से अपना रहे हैं।
गुजरात वैकल्पिक ऊर्जा के इस्तेमाल में बन रहा आत्मनिर्भर, 250 छात्राओं का संस्थान बना बायोगैस का सफल मॉडल

गांधीनगर, 28 मार्च (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के दूरदर्शी नेतृत्व में गुजरात वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। पूरे राज्य में संस्थान खाना पकाने के लिए एक टिकाऊ ईंधन के तौर पर बायोगैस को तेजी से अपना रहे हैं।

इसका एक बेहतरीन उदाहरण राज्य की राजधानी गांधीनगर के पास अडालज में स्थित 'श्रीमती मानेकबा विनय विहार एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स' है। हॉस्टल में पढ़ने और रहने वाली 250 से ज्‍यादा छात्राएं, साथ ही स्टाफ के परिवार, खाना पकाने के लिए गैस के मामले में आत्मनिर्भर बन गए हैं।

इस संस्थान ने गुजरात सरकार की 'संस्थागत बायोगैस प्लांट योजना' के जरिए ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की है। फ़िलहाल, कैंपस में 45 क्यूबिक मीटर क्षमता वाले दो बायोगैस प्लांट चल रहे हैं, जिनकी कुल क्षमता रोजाना 90 क्यूबिक मीटर है।

'वसुमति चैरिटी ट्रस्ट' द्वारा संचालित इस संस्थान में एक बड़ी गौशाला भी है, जिसमें लगभग 222 गायें हैं। हॉस्टल में 250 से ज्‍यादा छात्राएं रहती हैं, और उनके लिए खाना एक ही रसोई में बनाया जाता है।

संस्थान के प्रबंधन के मुताबिक, लगभग 250 छात्राओं के लिए दिन में दो बार खाना बनाया जाता है यानी रोजाना 500 से ज्‍यादा लोगों को खाना खिलाया जाता है। इसके अलावा, कैंपस में रहने वाले लगभग 15 परिवार भी खाना पकाने के लिए बायोगैस प्लांट से बनी गैस का इस्तेमाल करते हैं।

संस्थान के मैनेजर राहुल पटेल ने बताया कि सरकार की इस योजना के तहत मिली सब्सिडी की मदद से कैंपस खाना पकाने के लिए गैस के मामले में आत्मनिर्भर बन पाया है। उन्होंने कहा, "हमारे पास बड़ी संख्या में गायें हैं, इसलिए बायोगैस बनाने के लिए हमें गोबर की कोई कमी नहीं होती। गैस बनने के बाद जो स्लरी (तरल मिश्रण) बचती है, उसे हम अपने खेतों में जैविक खाद के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, जिससे हम पूरी तरह से जैविक खेती कर पाते हैं।"

संस्थान के अधिकारियों ने बताया कि बायोगैस प्लांट न होने पर उन्हें हर महीने लगभग 30 एलपीजी सिलेंडरों की जरूरत पड़ती। अभी उन्हें एक भी सिलेंडर की जरूरत नहीं पड़ती। इसके अलावा, स्लरी के इस्तेमाल से रासायनिक खादों की जरूरत भी खत्म हो गई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में, गुजरात वैकल्पिक ऊर्जा के इस्तेमाल में आत्मनिर्भर बन रहा है।

पूरे गुजरात में गौशालाएं, पांजरापोल, शिक्षण संस्थान और चैरिटेबल ट्रस्ट बड़ी मात्रा में जैविक कचरा पैदा करते हैं, जिसमें पशुओं का गोबर, खेती का बचा हुआ कचरा और रसोई का कचरा शामिल है। एनारोबिक डीकंपोज़िशन (हवा की गैर-मौजूदगी में सड़ने की प्रक्रिया) के जरिए, इस कचरे को बायोगैस में बदला जाता है, जो खाना पकाने के लिए एक सस्ता ईंधन उपलब्ध कराता है। इस प्रक्रिया से बचा हुआ पदार्थ स्लरी, पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद का काम करता है।

वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देने और जैविक कचरे का वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल करने के लिए, राज्य सरकार ने संस्थागत बायोगैस प्लांट लगाने के लिए एक खास योजना लागू की है। इस पहल का मकसद ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ाना, पर्यावरण प्रदूषण कम करना और सतत विकास को बढ़ावा देना है।

इस योजना के तहत, गुजरात ऊर्जा विकास एजेंसी (जीईडीए) द्वारा 25, 35, 45, 60 और 85 क्यूबिक मीटर क्षमता वाले प्लांटों के लिए सहायता दी जाती है। गैर-लाभकारी संगठनों को 75 प्रतिशत तक की सब्सिडी मिलती है, जबकि लाभ कमाने वाले संस्थानों को 50 प्रतिशत तक की सहायता मिल सकती है।

वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान, इस योजना के तहत 12 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, और अभी लगभग 60 संस्थागत बायोगैस प्लांट लगाने का काम चल रहा है। इस योजना को लागू करने के लिए कुल 15 एजेंसियों को पैनल में शामिल किया गया है।

पिछले पांच वर्षों (2021–22 से 2025–26) के दौरान, पूरे राज्य में कुल 193 संस्थागत बायोगैस प्लांट लगाए गए हैं, जिनकी कुल क्षमता प्रतिदिन 13,955 क्यूबिक मीटर है। आने वाले वित्त वर्ष 2026–27 के लिए, राज्य सरकार ने इस योजना के तहत फिर से 12 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं, और लगभग 60 और बायोगैस प्लांट लगाने की योजना है।

--आईएएनएस

एएसएच/डीएससी

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