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जीआई टैग मिलने के बाद बढ़ी चंपारण के मर्चा चूड़ा की मांग, अनोखी खुशबू बनी पहचान

जीआई टैग मिलने के बाद बढ़ी चंपारण के मर्चा चूड़ा की मांग, अनोखी खुशबू बनी पहचान
जीआई टैग मिलने के बाद बढ़ी चंपारण के मर्चा चूड़ा की मांग, अनोखी खुशबू बनी पहचान

चंपारण, 20 सितंबर (आईएएनएस)। चंपारण के प्रसिद्ध मर्चा चूड़ा को जीआई टैग मिलने के बाद इसकी मांग देश-विदेश में बढ़ गई है। चूड़ा कारोबारी रामजी प्रसाद ने बताया कि मर्चा चूड़ा की सबसे खास विशेषता इसकी अनोखी सुगंध है, जो पूरे घर को महका देती है।

आईएएनएस से बातचीत में कारोबारी ने बताया कि जीआई टैग मिलने के बाद लोग मर्चा चूड़ा के महत्व और इसकी खासियत को समझने लगे हैं। मर्चा धान की कुटाई के दौरान निकलने वाली खुशबू से पूरा मिल महक उठता है। जब इसे झोले में पैक किया जाता है, तो पैकेट के आसपास भी इसकी सुगंध महसूस होती है। जिस घर में इसे रखा जाता है, वहां भी इसकी खुशबू बनी रहती है।

रामजी प्रसाद ने कहा कि चंपारण की मिट्टी में पैदा होने वाले मर्चा धान की यही खासियत इसे दूसरी जगहों के धान से अलग बनाती है। उन्होंने बताया कि चंपारण के बाहर दूसरी जगहों पर मर्चा धान की खेती करने पर इसमें वही विशिष्ट सुगंध नहीं आती।

उन्होंने कहा कि चंपारण के कुछ क्षेत्रों में किसान मर्चा धान की खेती कर रहे हैं और इससे उन्हें आर्थिक लाभ भी मिल रहा है। उन्होंने किसानों से अधिक से अधिक मात्रा में मर्चा धान की खेती करने की अपील की, ताकि इसकी बढ़ती मांग का लाभ किसानों और कारोबारियों दोनों को मिल सके।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में मर्चा चूड़ा करीब 150 रुपए प्रति किलोग्राम की कीमत पर बिक रहा है। उन्होंने कहा कि यदि किसान इसकी पैदावार बढ़ाते हैं, तो इससे क्षेत्र के अधिक लोगों को आर्थिक लाभ मिल सकता है।

मर्चा धान की खेती सावन के महीने में शुरू होती है और नवंबर के आखिर तक इसकी फसल तैयार हो जाती है। मर्चा चूड़ा की खुशबू के पीछे चंपारण की मिट्टी की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसकी खेती पारंपरिक और ऑर्गेनिक तरीके से की जाती है। इसमें केमिकल और फर्टिलाइजर का इस्तेमाल नहीं किया जाता। मर्चा धान की आकृति भी इसे दूसरे धान से अलग बनाती है। इसका दाना काली मिर्च की तरह दिखाई देता है, इसलिए इसे मर्चा या मर्चा धान कहा जाता है।

मर्चा चूड़ा को बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तराखंड और झारखंड समेत कई राज्यों में भेजा जाता है। इतना ही नहीं, विदेश जाने वाले लोग भी मर्चा चूड़ा अपने साथ उपहार के तौर पर लेकर जाते हैं।

रामजी प्रसाद के मुताबिक, मर्चा चूड़ा का कारोबार उनके परिवार में 1969 से चला आ रहा है। पहले मर्चा धान की कुटाई पूरी तरह हाथ से की जाती थी। इस प्रक्रिया में काफी समय और मेहनत लगती थी। इसके बाद 1997 में चूड़ा तैयार करने के लिए मशीन लगाई गई। फिर समय के साथ कई नए प्रयोग किए गए और कारोबार का विस्तार होता गया। हर महीने करीब 50 से 60 क्विंटल मर्चा चूड़ा तैयार किया जाता है। इस उद्योग से करीब 100 लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

--आईएएनएस

डीकेएम/वीसी

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