राजस्थान के संगीत जगत में तगाराम भील का नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध है। महज 10 वर्ष की उम्र में उन्होंने अलगोजा वाद्य पर अपनी पकड़ बना ली थी और तब से उनका संगीत जीवन लगातार सफलता की ओर बढ़ता रहा।
साल 1981 में तगाराम भील ने जैसलमेर के मरु महोत्सव में अपने मंचीय सफर की शुरुआत की। उस समय उन्होंने अपनी कला और वादन कौशल से दर्शकों का मन मोह लिया। मरु महोत्सव में उनके प्रदर्शन ने उन्हें स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
तगाराम भील की मेहनत और प्रतिभा ने उन्हें आगे चलकर 1996 में फ्रांस तक पहुंचाया, जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलगोजा वादन का प्रदर्शन किया। उनके संगीत ने न केवल भारतीय श्रोताओं बल्कि विदेशी दर्शकों को भी मंत्रमुग्ध कर दिया।
विशेषज्ञों के अनुसार, तगाराम भील का यह सफर स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक वाद्य कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रेरणादायक उदाहरण है। उनके प्रदर्शन ने यह साबित किया कि प्रतिभा, समर्पण और मेहनत से कलाकार छोटे गांवों से भी विश्व मंच तक पहुंच सकते हैं।
आज तगाराम भील राजस्थान और भारत के संगीत प्रेमियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनका जीवन और संगीत यात्रा यह संदेश देती है कि किसी भी उम्र में अगर प्रतिभा और लगन हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।

