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कार से लेकर शेविंग क्रीम तक... प्रॉडक्ट कोई भी हो, विज्ञापन में 'स्त्री देह' ही क्यों?

कार से लेकर शेविंग क्रीम तक... प्रॉडक्ट कोई भी हो, विज्ञापन में 'स्त्री देह' ही क्यों?

बॉलीवुड एक्ट्रेस कृति सेनन का एक राखी विज्ञापन इन दिनों चर्चा में है। विज्ञापन में उनके कपड़ों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, यह मामला सिर्फ एक विज्ञापन या किसी एक एक्ट्रेस के पहनावे तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा सवाल है कि विज्ञापनों, मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों में महिलाओं को अक्सर उनके काम और प्रतिभा के बजाय उनके लुक और शरीर के आधार पर क्यों पेश किया जाता है।

सवाल यह है कि क्या महिलाओं की पहचान सिर्फ उनके रूप-रंग तक सीमित कर दी जाती है या फिर समाज और मीडिया का नजरिया ही ऐसा बन चुका है?

सिर्फ कम कपड़ों का मामला नहीं

महिलाओं को कम कपड़ों में दिखाने पर बहस अक्सर उनके पहनावे तक सीमित रह जाती है। लेकिन असली मुद्दा इससे कहीं बड़ा है। विज्ञापन और मीडिया में महिलाओं की मौजूदगी, उन्हें मिलने वाली पहचान और उनके काम को देखने का नजरिया भी इसका हिस्सा है।

कई क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या कम होने के कारण उन्हें पुरुषों के बीच अपनी जगह बनाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कई बार उनके लुक, कपड़ों और निजी जिंदगी को उनके काम से ज्यादा महत्व दिया जाता है।

प्रोफेशनल दुनिया में महिलाओं की कम मौजूदगी

महिलाओं की कम भागीदारी सिर्फ विज्ञापन उद्योग की समस्या नहीं है। पढ़ाई से लेकर नौकरी और नेतृत्व की भूमिकाओं तक कई क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या कम दिखाई देती है।

इसके पीछे सामाजिक सोच भी एक बड़ी वजह मानी जाती है। बचपन से लड़कियों को कई बार यह सुनना पड़ता है कि गणित, विज्ञान, इंजीनियरिंग या टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र लड़कों के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं। ऐसी सोच उनके करियर के फैसलों पर भी असर डाल सकती है।

कार्यस्थल पर असहज माहौल और महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह भी उनकी भागीदारी को प्रभावित करते हैं। अगर किसी महिला को उसके काम के बजाय उसके रूप-रंग के आधार पर देखा जाए, तो उसके लिए प्रोफेशनल पहचान बनाना और मुश्किल हो जाता है।

मीडिया में भी महिलाओं की तस्वीर अलग क्यों?

मीडिया और विज्ञापनों में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ी है, लेकिन सवाल यह है कि उन्हें किस रूप में दिखाया जाता है।

कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि मीडिया में पुरुषों को एक्सपर्ट, वैज्ञानिक, नेता या उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्ति के रूप में ज्यादा दिखाया जाता है, जबकि महिलाओं की चर्चा कई बार उनके पहनावे, परिवार, शादी या व्यक्तिगत जीवन के आसपास ज्यादा रहती है।

इसका असर बचपन से ही पड़ता है। अगर किताबों, विज्ञापनों और मीडिया में बच्चों को ज्यादातर पुरुषों को वैज्ञानिक, आविष्कारक और लीडर के रूप में दिखाया जाए, तो समाज में यह धारणा मजबूत हो सकती है कि बड़े फैसले और उपलब्धियां पुरुषों से जुड़ी चीजें हैं।

महिलाओं का ऑब्जेक्टिफिकेशन क्यों होता है?

महिलाओं को एक व्यक्ति के बजाय उनकी सुंदरता या शरीर के आधार पर पेश करना ऑब्जेक्टिफिकेशन कहलाता है। विज्ञापन उद्योग में इसका इस्तेमाल लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है।

ऑटोमोबाइल, फैशन, टेक्नोलॉजी और कई दूसरे क्षेत्रों के विज्ञापनों में भी कभी-कभी महिला मॉडल का इस्तेमाल प्रोडक्ट से ज्यादा ध्यान आकर्षित करने के लिए किया जाता है। ऐसे में महिला की पहचान उसके प्रोफेशन या प्रतिभा के बजाय उसकी खूबसूरती और पहनावे तक सीमित हो जाती है।

पुराने समय में भी महिलाओं की मीडिया कवरेज में उनके काम की तुलना में शादी, परिवार और व्यक्तिगत जीवन को ज्यादा जगह मिलने के उदाहरण सामने आए हैं। हालांकि, समय के साथ यह तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है।

बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है

पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं को उनके काम और उपलब्धियों के लिए ज्यादा जगह मिलने लगी है। अब महिलाएं वैज्ञानिक, इंजीनियर, पायलट, डॉक्टर, कारोबारी, नेता और टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट के रूप में भी मीडिया में दिखाई देती हैं।

फिर भी बदलाव की रफ्तार धीमी है। जरूरत इस बात की है कि महिलाओं को सिर्फ उनकी खूबसूरती या कपड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी प्रतिभा, मेहनत और उपलब्धियों के लिए पहचान मिले।

कृति सेनन के विज्ञापन पर हुई बहस इसी बड़े सवाल की तरफ इशारा करती है। मुद्दा सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि किसी महिला ने क्या पहना है, बल्कि यह भी होना चाहिए कि उसे किस नजरिए से पेश किया जा रहा है और उसकी असली पहचान क्या है।

महिलाओं को विज्ञापनों और मीडिया में सिर्फ आकर्षण का हिस्सा नहीं, बल्कि एक कलाकार, प्रोफेशनल और उपलब्धि हासिल करने वाले व्यक्ति के तौर पर दिखाना जरूरी है।

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