जेल खाते से 52 लाख की जालसाजी, चुराई गई चेकबुक से 17 महीने तक निकाले रुपये, जेल अफसरों की भूमिका पर सवाल
जिला कारागार के सरकारी खाते से 52 लाख रुपये से अधिक की फर्जी निकासी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस घोटाले ने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में सामने आया है कि जेल से रिहा हुए कुछ आरोपियों ने चुराई गई चेकबुक का इस्तेमाल करते हुए जेल अधीक्षक के फर्जी हस्ताक्षर बनाकर 17 महीने तक बैंक से लाखों रुपये निकाल लिए — और इस दौरान जेल अफसरों को इसकी भनक तक नहीं लगी।
सूत्रों के अनुसार, मामला तब उजागर हुआ जब हाल ही में जिला कारागार के वित्तीय ऑडिट के दौरान खाते से की गई संदिग्ध निकासी पर सवाल उठे। जब बैंक से जानकारी मांगी गई तो सामने आया कि जेल के खाते से कई चरणों में कुल 52 लाख रुपये से अधिक की रकम विभिन्न खातों में ट्रांसफर और निकाली गई थी।
जांच के दौरान पता चला कि यह रकम रिहा हुए एक पूर्व बंदी और उसके साथियों ने निकाली थी। बताया जा रहा है कि जेल में रहते हुए आरोपी ने किसी तरह जेल के सरकारी खाते की चेकबुक चोरी कर ली थी। जेल से रिहाई के बाद उसने अधिकारियों के नकली साइन बनाकर बैंक में प्रस्तुत किए और लगातार लगभग 17 महीनों तक रकम निकालता रहा।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतने लंबे समय तक किसी अधिकारी को इसकी जानकारी नहीं हुई। न तो खाते का नियमित मिलान हुआ और न ही किसी ने बैंक स्टेटमेंट की जांच की। इससे साफ है कि या तो जेल प्रशासन की गंभीर लापरवाही हुई है या फिर इसमें अंदरूनी मिलीभगत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
जिला प्रशासन और पुलिस ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच शुरू कर दी है। फिलहाल, बैंक और जेल रिकॉर्ड जब्त कर लिए गए हैं। फॉरेंसिक टीम चेकों पर लगे हस्ताक्षरों की जांच कर रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि फर्जी दस्तखत किसने किए।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) ने बताया,
“प्राथमिक जांच में सामने आया है कि यह फर्जीवाड़ा लंबे समय तक चलता रहा। जेल के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध लग रही है। हम सभी संबंधित लोगों से पूछताछ कर रहे हैं। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
इधर, जेल विभाग के आला अधिकारी भी हरकत में आ गए हैं। विभाग ने संबंधित जेल अधीक्षक और लेखाकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। साथ ही, राज्य स्तर पर एक आंतरिक जांच समिति गठित की गई है जो पूरे मामले की निगरानी करेगी।
वित्त विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी खातों में इस तरह की धोखाधड़ी संभव नहीं होती जब तक कि सिस्टम में गंभीर चूक या अंदरूनी सहयोग न हो।
स्थानीय स्तर पर यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर जेल जैसी उच्च सुरक्षा वाली जगह से चेकबुक कैसे चोरी हुई और इतने महीनों तक कोई अनियमितता पकड़ में क्यों नहीं आई।

