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फिल्मों के जरिए समाज को आईना दिखाते थे वी शांताराम, हिंदी और मराठी सिनेमा में छोड़ी छाप

फिल्मों के जरिए समाज को आईना दिखाते थे वी शांताराम, हिंदी और मराठी सिनेमा में छोड़ी छाप
फिल्मों के जरिए समाज को आईना दिखाते थे वी शांताराम, हिंदी और मराठी सिनेमा में छोड़ी छाप

मुंबई, 29 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी उन फिल्मकारों का जिक्र होगा, जिन्होंने मनोरंजन के साथ समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया तो वी. शांताराम का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाएगा। निर्देशक, निर्माता, अभिनेता और दूरदर्शी फिल्मकार के रूप में उन्होंने भारतीय सिनेमा को नई पहचान दी। उन्हें भारतीय सिनेमा के अग्रदूतों में गिना जाता है।

वी. शांताराम का पूरा नाम शांताराम राजाराम वणकुद्रे था। उनका जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश भारत की एक रियासत थी। वे साधारण परिवार से आते थे और बचपन आर्थिक चुनौतियों के बीच बीता।

शांताराम ने अपने करियर की शुरुआत कोल्हापुर स्थित महाराष्ट्र फिल्म कंपनी से की। यहां उन्होंने सेट निर्माण, संपादन, अभिनय और तकनीकी कार्यों सहित फिल्म निर्माण के लगभग हर पहलू को सीखा। बाद में उन्होंने 1927 में अपनी पहली निर्देशित फिल्म 'नेताजी पालकर' बनाई।

साल 1929 में उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना की। यह स्टूडियो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में शामिल हुआ। 1932 में उन्होंने मराठी की शुरुआती टॉकी फिल्मों में शामिल 'अयोध्याचा राजा' का निर्देशन किया।

वी. शांताराम मानते थे कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाने का शक्तिशाली साधन है। उनकी फिल्मों में सामाजिक कुरीतियों, महिला अधिकारों, सांप्रदायिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों को प्रमुखता मिली।

उनकी प्रमुख फिल्मों में दुनिया न माने (1937), मानूस (1939), डॉ. कोटणीस की अमर कहानी (1946), झनक झनक पायल बाजे (1955), दो आंखें बारह हाथ (1957), नवरंग (1959), स्त्री (1961), पिंजरा (1972) शामिल हैं। इन फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को नई तकनीक, नए विषय और नई सोच दी।

1942 में उन्होंने राजकमल कलामंदिर की स्थापना की, जो आगे चलकर देश के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म स्टूडियो में से एक बना।

वी. शांताराम की निजी जिंदगी भी काफी चर्चित रही। उन्होंने अपने जीवन में तीन शादियां कीं। पहली पत्नी विमलाबाई थीं, जिनसे उनके चार बच्चे हुए। बाद में जब वह अपने करियर में सफल हुए तो उन्होंने अभिनेत्री जयश्री से विवाह किया, जिनसे तीन बच्चे हुए। इसके बाद उन्होंने अभिनेत्री संध्या से शादी की, जो उनकी कई फिल्मों की प्रमुख अभिनेत्री रहीं।

उनकी दूसरी शादी और बाद का वैवाहिक जीवन उस दौर में काफी चर्चा और विवाद का विषय रहा था। हालांकि, इन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने फिल्मी काम को प्रभावित नहीं होने दिया।

उनके बच्चों में उनके बेटे प्रभातकुमार डायरेक्टर बने, किरण शांताराम ने खुद को डायरेक्टर-प्रोड्यूसर के तौर पर स्थापित किया, और राजकमल स्टूडियो को सफलतापूर्वक चला रहे हैं। बेटी मधुरा पंडित जसराज एक राइटर-फिल्ममेकर हैं। एक्ट्रेस राजश्री को शांताराम ने ही लॉन्च किया था।

वी. शांताराम को भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। दादासाहेब फाल्के पुरस्कार (1985), पद्म विभूषण (मरणोपरांत, 1992) से उन्हें सम्मानित किया गया।

1970 और 1980 के दशक में सक्रिय फिल्म निर्माण से दूरी बनाने के बावजूद वी. शांताराम भारतीय सिनेमा से जुड़े रहे। उनका अधिकांश समय परिवार, स्टूडियो और सिनेमा के विकास से जुड़े कार्यों में बीता।

भारतीय सिनेमा के इस महान शिल्पकार का निधन 30 अक्टूबर 1990 को मुंबई में 88 वर्ष की आयु में हुआ। कई जगहों पर उनका निधन 28 अक्टूबर बताया गया है। उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत हुआ, लेकिन उनकी फिल्में और विचार आज भी नई पीढ़ी के फिल्मकारों को प्रेरित करते हैं।

--आईएएनएस

एएमटी/डीकेपी

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