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फल्गुनी, प्यार और दशरथ, 'जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं' वाले हौसले से पहाड़ में बनाया रास्ता

नई दिल्ली, 13 जनवरी (आईएएनएस)। 'भगवान के भरोसे मत बैठिए, क्या पता भगवान हमारे भरोसे बैठा हो!' यह महज एक संवाद नहीं, बल्कि उस शख्स की जीवन दृष्टि है, जिसने दुनिया को सिखाया कि अगर इंसान ठान ले, तो पत्थर का सीना चीरकर भी रास्ता बनाया जा सकता है। हम बात कर रहे हैं 'माउंटेन मैन' दशरथ मांझी की।
फल्गुनी, प्यार और दशरथ, 'जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं' वाले हौसले से पहाड़ में बनाया रास्ता

नई दिल्ली, 13 जनवरी (आईएएनएस)। 'भगवान के भरोसे मत बैठिए, क्या पता भगवान हमारे भरोसे बैठा हो!' यह महज एक संवाद नहीं, बल्कि उस शख्स की जीवन दृष्टि है, जिसने दुनिया को सिखाया कि अगर इंसान ठान ले, तो पत्थर का सीना चीरकर भी रास्ता बनाया जा सकता है। हम बात कर रहे हैं 'माउंटेन मैन' दशरथ मांझी की।

बिहार के गया जी जिले की तपती धरती और गेहलौर की पथरीली पहाड़ियों के बीच यह कहानी किसी लोककथा जैसी लगती है, लेकिन यह हकीकत के पसीने से लिखी गई एक ऐसी इबारत है, जिसे वक्त कभी नहीं मिटा पाएगा।

इस कहानी की शुरुआत किसी युद्ध से नहीं, बल्कि एक गहरी टीस और अधूरे रह गए प्रेम से होती है। साल 1959 की एक दोपहर, गेहलौर की दुर्गम पहाड़ियों पर दशरथ मांझी मिट्टी खोद रहे थे। उनकी पत्नी, फल्गुनी देवी, उनके लिए दोपहर का खाना लेकर आ रही थीं। तपती धूप और नुकीली चट्टानों के बीच फल्गुनी का पैर फिसला और वह गहरी खाई में गिर गईं।

वजीरगंज का अस्पताल गांव से सिर्फ 15 किलोमीटर दूर था, लेकिन बीच में खड़े अभेद्य पहाड़ की वजह से यह दूरी 70 किलोमीटर के चक्कर में तब्दील हो गई थी। जब तक दशरथ उन्हें अस्पताल ले जाने की कोशिश करते, फल्गुनी ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। उसी दिन, उसी क्षण, एक भूमिहीन मजदूर ने उस विशाल पहाड़ को चुनौती दे डाली, "जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं।"

1960 में जब दशरथ ने पहली बार पहाड़ पर हथौड़ा चलाया, तो लोगों ने उन्हें 'पागल' कहा। गांव वालों को लगा कि पत्नी के वियोग में इस शख्स ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है। क्वार्टजाइट की वे कठोर चट्टानें, जो 1.6 बिलियन साल पुरानी थीं, एक साधारण छेनी और हथौड़े से टूटने वाली नहीं थीं।

लेकिन दशरथ का अनुशासन फौलादी था। वे सुबह तड़के उठते, दिन भर खेतों में मजदूरी करते ताकि घर का चूल्हा जल सके, और दोपहर से देर रात तक उस पहाड़ को तराशते। जब चट्टानें बहुत सख्त होतीं, तो वह उन पर सूखी लकड़ी जलाते और फिर अचानक पानी डाल देते। ऊष्मीय तनाव से चट्टानें चटकतीं और वह फिर से प्रहार करते। उनके हाथ छिलते रहे, पैर जख्मी हुए, लेकिन उनका संकल्प चट्टान से भी भारी था।

22 साल बीत गए। 1982 तक उन्होंने अकेले ही 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट ऊंचा रास्ता बना दिया। वह पहाड़ जो कभी मौत का कारण बना था, अब जीवन की राह दे रहा था। अत्री और वजीरगंज की दूरी 55 किलोमीटर से घटकर मात्र 15 किलोमीटर रह गई।

दशरथ मांझी जिस 'मुसहर' समुदाय से आते थे, उन्हें समाज के सबसे निचले पायदान पर रखा गया था। उनके इस 'पागलपन' ने पूरे इलाके की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बदल दी। अब बच्चों के लिए स्कूल और बीमारों के लिए अस्पताल करीब थे।

हैरानी की बात यह है कि जिस पहाड़ को उन्होंने 22 साल में काटा, उसे पक्की सड़क में तब्दील करने में सरकार को दशकों लग गए। साल 2011 में, उनकी मृत्यु के 4 साल बाद जाकर उस मार्ग पर डामर बिछाया गया। उन्हें 'बिहार रत्न' से नवाजा गया और उनके नाम पर डाक टिकट भी जारी हुआ। दशरथ मांझी की मृत्यु 17 अगस्त 2007 को हुई थी।

दशरथ मांझी की इस अविश्वसनीय गाथा को साल 2015 में निर्देशक केतन मेहता ने फिल्म 'मांझी: द माउंटेन मैन' के जरिए वैश्विक मंच पर पहुंचाया। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने पर्दे पर दशरथ के किरदार को जिस जीवंतता से जिया, उसने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया।

आज के दौर में, गेहलौर की वह घाटी एक तीर्थ स्थल जैसी है। वहां दशरथ मांझी का भव्य स्मारक और प्रतिमा स्थापित है। एसबीआई फाउंडेशन जैसे संस्थान 'सम्मान' कार्यक्रम के जरिए गांव में शिक्षा और एम्बुलेंस सेवाएं पहुंचा रहे हैं।

--आईएएनएस

वीकेयू/एबीएम

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