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फैयाज खां स्मृति शेष: ध्रुपद-खयाल के बेताज बादशाह, हुनर से बने 'आफताब-ए-मौसिकी'

फैयाज खां स्मृति शेष: ध्रुपद-खयाल के बेताज बादशाह, हुनर से बने 'आफताब-ए-मौसिकी'
फैयाज खां स्मृति शेष: ध्रुपद-खयाल के बेताज बादशाह, हुनर से बने 'आफताब-ए-मौसिकी'

मुंबई, 4 नवंबर (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है, जिसकी जड़ें वेदों, विशेष रूप से सामवेद में हैं। यह दुनिया की सबसे पुरानी कलात्मक परंपराओं में से एक है। कई गायकों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई हैं। उन्हीं में से एक फैयाज खा हैं।

फैयाज खां 20वीं शताब्दी में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रमुख गायन शैलियां ध्रुपद और ख्याल के श्रेष्ठतम गायक थे। उनका जन्म 8 फरवरी 1886 को ब्रिटिश शासन काल में उत्तर प्रदेश के आगरा के पास सिकंदरा में एक संगीतकार परिवार में हुआ था। वे लोकप्रिय रूप से 'आफताब-ए-मौसिकी' के नाम से जाने जाते थे।

फैयाज खां के जन्म से कुछ माह पहले ही उनके पिता सफदर हुसैन खां का निधन हो गया था, जिसके बाद उनका पालन-पोषण और संगीत का प्रारंभिक प्रशिक्षण उनके नाना की देखरेख में हुआ। 25 वर्ष की आयु तक फैयाज खां के नाना ही उनके गुरु और संरक्षक थे।

फैयाज खां देखने में काफी लंबे-चौड़े और मजबूत शरीर थे। जब वह मंच पर चढ़ते थे, तो एक पहलवान जैसे दिखते थे। वे अक्सर शेरवानी और साफा पहनते थे और उनकी मूंछें भी बड़ी थीं लेकिन शक्ल-सूरत के बिल्कुल विपरित उनकी आवाज गहरी, सुरीली और ताकतवर थी, जिसे सुनते ही लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

फैयाज खां के वैवाहिक जीवन की बात करें, तो शादी के कुछ ही समय बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया था। इसके बाद उन्होंने दूसरी शादी नहीं की और जीवन भर निःसंतान रहे। वह अपनी रचनाओं में उपनाम के तौर पर 'प्रेम प्रिया' का इस्तेमाल करते थे।

वे लंबे समय तक बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के दरबार में राजगायक रहे। इस दौरान उन्हें बड़ौदा दरबार से 'ज्ञान रत्न' की उपाधि मिली। इसके अलावा, उन्हें मैसूर के महाराजा द्वारा 'आफताब-ए-मौसिकी' की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था।

5 नवंबर 1950 को बड़ौदा में उनका निधन हुआ लेकिन भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए वे सदा याद किए जाएंगे। फैयाज खां गायन के सिर्फ एक बेताज बादशाह नहीं थे बल्कि वे संगीत के एक बेहतरीन शिक्षक भी थे। उन्होंने अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ी, जो आज भी संगीत सीखने वालों के लिए प्रेरणा का काम करती है।

--आईएएनएस

डीके/पीएम

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