42% पुरुषों की सालाना कमाई का 38% खा रही एलिमनी, लोन लेकर तलाक का खर्च उठाने को मजबूर है मर्द
भारत में तलाक का राष्ट्रीय औसत भले ही करीब 1% हो, लेकिन इसका आर्थिक असर पुरुषों पर बेहद गंभीर है। साल 2025 में फाइनेंस मैगज़ीन द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण (1,248 उत्तरदाताओं पर आधारित) ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। रिपोर्ट बताती है कि लगभग 42% तलाकशुदा पुरुषों को गुजारा भत्ता (Alimony) या कानूनी खर्चों को पूरा करने के लिए कर्ज लेना पड़ा, जबकि लगभग आधे पुरुषों ने 5 लाख रुपये से ज्यादा खर्च किए। यह स्थिति इस सच्चाई की ओर इशारा करती है कि भारत में तलाक सिर्फ एक रिश्ते का टूटना नहीं है, बल्कि यह बैंक खातों के खाली होने और आर्थिक अस्थिरता का कारण भी बनता जा रहा है।
🚨 Nearly 42% of men took loans for divorce proceedings or alimony in India.
— Indian Tech & Infra (@IndianTechGuide) October 1, 2025
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1. तलाक से जूझने के लिए कर्ज का सहारा
सर्वे के अनुसार, 42% पुरुषों ने तलाक की प्रक्रिया पूरी करने और गुजारा भत्ता चुकाने के लिए कर्ज लिया। यह सिर्फ कुछ महीनों का बोझ नहीं होता, बल्कि कई सालों तक चलता है। ऊँचे ब्याज दरों पर लिए गए ये लोन अक्सर पुरुषों को कर्ज़ के जाल में फंसा देते हैं।
2. गुजारा भत्ते की आसमान छूती लागत
तलाक की प्रक्रिया में सबसे बड़ा बोझ गुजारा भत्ते का होता है। रिपोर्ट के अनुसार, 49% पुरुषों ने 5 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया, जबकि यह आंकड़ा महिलाओं के लिए सिर्फ 19% था। यानी, तलाक का आर्थिक बोझ असमान रूप से पुरुषों पर ज्यादा पड़ता है।
3. नकारात्मक नेट वर्थ – एक छुपा हुआ संकट
सर्वेक्षण से यह भी सामने आया कि लगभग 29% पुरुषों की नेट वर्थ तलाक के बाद नकारात्मक हो गई। यानी, वे जितना कमाते या बचाते थे, उससे कहीं ज्यादा कर्ज़ में डूब गए। यह स्थिति उनके वित्तीय भविष्य को असुरक्षित बना देती है और पुनर्निर्माण की राह मुश्किल हो जाती है।
4. शहरी इलाकों में तलाक की बढ़ती दर
भारत में कुल तलाक दर भले ही कम हो, लेकिन शहरी क्षेत्रों में यह दर 30-40% तक बढ़ गई है। महानगरों में जीवनशैली, आधुनिक सोच और आर्थिक अपेक्षाओं की वजह से वैवाहिक टूटन अधिक हो रही है। और इसी कारण वित्तीय नुकसान भी शहरों में ज्यादा केंद्रित है।
5. कानूनी लड़ाई: जेब पर सबसे भारी
तलाक की प्रक्रिया आसान नहीं होती। वकीलों की फीस, लंबे समय तक चलने वाली सुनवाई, और गुजारा भत्ता विवाद महीनों या सालों तक चलते हैं। इस दौरान पुरुषों को अक्सर एक से ज्यादा लोन लेने पड़ते हैं, जिनमें से कई ऊँचे ब्याज दरों पर होते हैं। नतीजा यह कि मानसिक तनाव के साथ-साथ वित्तीय संकट और गहरा जाता है।
6. तलाक के बाद आर्थिक असमानता
सर्वे में यह भी सामने आया कि खासकर उच्च आय वर्ग के पुरुषों को अचानक से अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा खोना पड़ता है। तलाक के बाद उनकी वित्तीय स्थिति अस्थिर हो जाती है, जबकि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समझौते इस तरह से बनाए जाते हैं कि पुरुषों पर अधिक बोझ पड़े।
7. विवाह: एक भावनात्मक ही नहीं, आर्थिक जोखिम भी
सर्वे की सबसे बड़ी सीख यह है कि भारत में विवाह अब सिर्फ भावनात्मक प्रतिबद्धता नहीं रहा, बल्कि यह एक संभावित वित्तीय जोखिम भी बन गया है। तलाक की स्थिति में पुरुषों को अपने जीवनभर की जमा-पूंजी गंवानी पड़ सकती है।
केस स्टडी और उदाहरण
कुछ तलाकशुदा पुरुषों ने सर्वे में साझा किया कि उन्हें अपने परिवार से उधार लेना पड़ा, बैंक से पर्सनल लोन लेना पड़ा और कई बार प्रॉपर्टी तक गिरवी रखनी पड़ी। कई पुरुषों ने माना कि तलाक के बाद वे इतने कर्ज़ में डूब गए कि उनकी नेट वर्थ माइनस में चली गई।
नीति और कानून पर सवाल
यह स्थिति भारत में तलाक और गुजारा भत्ता कानूनों की समीक्षा की मांग भी उठाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक बोझ का असमान वितरण पुरुषों को वित्तीय असुरक्षा की ओर धकेल रहा है। भारत जैसे देश में, जहाँ सामाजिक सुरक्षा तंत्र उतना मजबूत नहीं है, यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है।
सामाजिक और मानसिक असर
तलाक सिर्फ वित्तीय नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी असर डालता है। कर्ज़ के बोझ और आर्थिक अस्थिरता की वजह से कई पुरुष डिप्रेशन और आत्मसम्मान की समस्याओं से जूझते हैं। यह संकट न सिर्फ उनके लिए, बल्कि उनके परिवार और बच्चों के लिए भी नुकसानदेह साबित होता है।
भारत में तलाक की दर भले ही कम हो, लेकिन जिन पुरुषों का रिश्ता टूटता है, उनके लिए यह सिर्फ एक भावनात्मक संकट नहीं बल्कि एक आर्थिक आपदा भी है। 42% पुरुषों का कर्ज लेना, 49% का 5 लाख से अधिक खर्च करना और 29% का नकारात्मक नेट वर्थ में जाना यह साबित करता है कि तलाक पुरुषों के लिए एक गहरी वित्तीय चुनौती है।यह रिपोर्ट हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या भारत में विवाह और तलाक के कानूनों को और संतुलित बनाने की जरूरत है? क्योंकि फिलहाल तलाक पुरुषों के लिए न सिर्फ भावनात्मक, बल्कि आर्थिक रूप से भी विनाशकारी साबित हो रहा है।

