'चुनाव आयोग ने शक्तियों का उल्लंघन कर फैसला दिया', सुप्रीम कोर्ट में 'शिवसेना विवाद' पर सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल की दलील
नई दिल्ली, 6 अगस्त (आईएएनएस)। महाराष्ट्र में शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस मामले में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलीलें पेश करते हुए चुनाव आयोग के फैसले पर कई सवाल उठाए।
कपिल सिब्बल ने अदालत को 2022 की कार्यकारिणी समिति के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उस बैठक में एकनाथ शिंदे को नेता के रूप में चुना गया था, लेकिन बाद में वही लोग अपने फैसले से मुकर गए। सिब्बल के अनुसार, शिंदे गुट ने पार्टी संविधान में अपनी मर्जी से बदलाव किए और संगठन के नियमों की अनदेखी की।
सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का उल्लंघन किया है। उनका तर्क था कि ईसीआई के पास पार्टी के संविधान की वैधता तय करने का अधिकार नहीं है। दोनों गुट 2018 के पार्टी संविधान के आधार पर सत्ता का दावा कर रहे थे, लेकिन चुनाव आयोग ने पार्टी के संविधान को नजरअंदाज कर दिया।
उन्होंने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग को लाखों एफिडेविट दिए गए थे, जिनमें पार्टी संगठन और कैडर के भारी बहुमत ने उद्धव ठाकरे के समर्थन में हस्ताक्षर किए थे। इसके बावजूद, ईसीआई ने पार्टी संगठन को नजरअंदाज किया और सिर्फ विधानसभा में विधायकों की संख्या के आधार पर नाम और सिंबल का फैसला दे दिया।
सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता था कि लेजिस्लेचर पार्टी में फूट और पार्टी में फूट एक ही चीज है। उनके मुताबिक ईसीआई का फैसला गलत है और यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
सिब्बल ने चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग यह तय नहीं कर सकता कि पार्टी का कौन सा संविधान वैध है। चुनाव आयोग अधिकतम किसी पार्टी की मान्यता रद्द कर सकता है। उन्होंने कहा कि जब संवैधानिक संस्थाएं लोगों का भरोसा नहीं जीततीं, तब ऐसे विवाद पैदा होते हैं। सिब्बल ने कांग्रेस का उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस भी दो फाड़ हुई थी, तब दोनों को अलग-अलग नाम दिए गए थे। लेकिन शिवसेना के मामले में निर्वाचन आयोग का निर्णय अन्यायपूर्ण था और यह अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण था।
वकील ने अदालत को बताया कि पहले विधायकों की अयोग्यता का निर्णय होना चाहिए था और उसके बाद नाम और सिंबल पर फैसला होना चाहिए था। लेकिन, आयोग ने पहले नाम और निशान पर फैसला दे दिया। इसके बाद शिंदे गुट को नाम और निशान मिल गया और उन्होंने चुनाव लड़ा और जीता भी। उन्होंने पहले पांच जजों की संविधान पीठ के सामने भी यही दलील दी थी, लेकिन पीठ ने उसे नहीं माना।
सिब्बल की दलील थी कि 21 जून 2022 को शिवसेना पार्टी में कोई विभाजन नहीं हुआ था। सिर्फ कुछ विधायक अलग हुए थे लेकिन पूरी पार्टी नहीं टूटी थी। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया। उनका कहना था कि आयोग को पहले यह देखना चाहिए था कि क्या वाकई में पूरी शिवसेना पार्टी दो हिस्सों में बंट गई थी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि दोनों मामले आपस में जुड़े होने के बावजूद कानूनी सवाल अलग-अलग हैं। स्पीकर यह तय करते हैं कि किसी विधायक ने खुद अपनी पार्टी छोड़ी है या नहीं ताकि उसकी सदस्यता पर फैसला हो सके। जबकि चुनाव आयोग का काम यह तय करना है कि असली राजनीतिक पार्टी कौन है और चुनाव चिह्न किसे मिलेगा।
जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट इस बात पर स्पष्टता चाहती है। उन्होंने सुभाष देसाई वाले मामले का जिक्र करते हुए कहा कि सिर्फ विधायक दल छोड़ देने से यह नहीं माना जा सकता कि विधायक ने राजनीतिक पार्टी भी छोड़ दी है। ऐसे में सवाल है कि स्पीकर किस आधार पर तय करेंगे कि विधायक ने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ दी। क्या सिर्फ पार्टी प्रमुख की बैठक में न जाना, गुवाहाटी चले जाना और दूसरी पार्टी के नेताओं के साथ रहना ही, इसका आधार होगा।
इस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि शिंदे गुट ने अपना अलग प्रस्ताव पारित किया और उद्धव ठाकरे के व्हिप की जगह अपना नया व्हिप भी नियुक्त कर दिया। यह भी पार्टी छोड़ने का संकेत है। जस्टिस बागची ने कहा कि ये सब अयोग्यता याचिका दायर होने के बाद हुआ था और सवाल यह है कि क्या बाद की घटनाओं को आधार बनाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में कहा गया है कि अयोग्यता का फैसला मुख्य रूप से याचिका दाखिल होने की तारीख पर मौजूद तथ्यों के आधार पर किया जाता है।
--आईएएनएस
एससीएच/एबीएम

