अल नीनो का असर: दक्षिण और पश्चिम भारत में सूखे के हालात, वीडियो में जाने कर्नाटक के 226 तालुके सूखाग्रस्त; चावल की कीमतें 50% तक बढ़ीं
भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में अल नीनो का असर दिखाई देने लगा है। कमजोर मानसून और बारिश की कमी के कारण दक्षिण और पश्चिम भारत के कई राज्यों में सूखे जैसे हालात बन गए हैं। जलाशयों का जलस्तर गिरने से खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संकट गहराता जा रहा है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना में बड़ी संख्या में इलाके सूखाग्रस्त बताए गए हैं। इसका असर किसानों की फसलों से लेकर आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा में पानी की कमी के कारण धान की खेती का रकबा एक लाख एकड़ से ज्यादा घट गया है। वहीं, चावल की कुछ किस्मों की कीमतों में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने की जानकारी सामने आई है।
कर्नाटक में 240 में से 226 तालुके सूखाग्रस्त
कमजोर मानसून का सबसे गंभीर असर कर्नाटक में देखने को मिल रहा है। राज्य के 240 तालुकों में से 226 तालुकों को सूखाग्रस्त बताया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के करीब 94.1 प्रतिशत तालुके सूखे की चपेट में हैं।बारिश की कमी के कारण खेती के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। इससे खरीफ फसलों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। राज्य में करीब 33 प्रतिशत फसल बर्बाद होने का अनुमान लगाया गया है। फसलों को नुकसान होने से किसानों की आमदनी प्रभावित हो रही है। वहीं, सिंचाई के लिए जलाशयों पर निर्भर रहने वाले क्षेत्रों में पानी की कमी ने चिंता बढ़ा दी है।
आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में भी सूखे का संकट
आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में भी बारिश की कमी का असर कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है। आंकड़ों के अनुसार, आंध्र प्रदेश के करीब 56.4 प्रतिशत तालुके और महाराष्ट्र के 86.4 प्रतिशत तालुके सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं।महाराष्ट्र में फसलें सूखने और कर्ज का दबाव किसानों के लिए गंभीर समस्या बन गया है। इसी बीच, सात दिनों के भीतर चार किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आने की जानकारी दी गई है। खेती में नुकसान और आर्थिक परेशानियों के कारण ग्रामीण इलाकों में संकट गहराने की आशंका है।सूखे की स्थिति के चलते किसानों को अगली फसल की तैयारी, सिंचाई और घरेलू खर्चों को पूरा करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
तेलंगाना के 45.6 प्रतिशत मंडल सूखाग्रस्त
तेलंगाना में भी पानी की कमी का असर दिखाई दे रहा है। राज्य के करीब 45.6 प्रतिशत मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने की जानकारी सामने आई है। जलाशयों में पानी की कमी और कमजोर बारिश के कारण खेती पर दबाव बढ़ रहा है।ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि गतिविधियां काफी हद तक बारिश और सिंचाई के पानी पर निर्भर करती हैं। ऐसे में लंबे समय तक पानी की कमी रहने से फसल उत्पादन और किसानों की आय दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
तमिलनाडु में धान की खेती का रकबा घटा, चावल महंगा
तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में पानी की कमी का सीधा असर धान की खेती पर पड़ा है। यहां धान की खेती का रकबा एक लाख एकड़ से ज्यादा घट गया है। पानी की उपलब्धता कम होने के कारण किसानों के लिए फसल की बुवाई और सिंचाई करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।धान के उत्पादन पर असर पड़ने से चावल की कुछ किस्मों की कीमतों में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जानकारी सामने आई है। यदि उत्पादन प्रभावित रहता है, तो खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
अल नीनो से बढ़ सकती हैं मुश्किलें
अल नीनो एक जलवायु घटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के सतही पानी का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश और तापमान के पैटर्न पर पड़ सकता है। हालांकि, किसी विशेष क्षेत्र में सूखे की स्थिति के लिए स्थानीय मौसम, बारिश और जल प्रबंधन जैसे कई कारक भी जिम्मेदार होते हैं।दक्षिण और पश्चिम भारत में मौजूदा जल संकट ने कृषि, ग्रामीण रोजगार और खाद्य कीमतों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। आने वाले समय में बारिश और जलाशयों के जलस्तर में सुधार इस संकट की गंभीरता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

