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Dussehra 2026: कहीं 111 फीट का रावण तो कहीं जलेगा 30 फीट का कॉकरोच, जानें देशभर में दशहरे की अनोखी परंपराएं

Dussehra 2026: कहीं 111 फीट का रावण तो कहीं जलेगा 30 फीट का कॉकरोच, जानें देशभर में दशहरे की अनोखी परंपराएं

देशभर में आज दशहरा यानी विजयादशमी का त्योहार मनाया जा रहा है। इस मौके पर कई शहरों में रावण दहन के भव्य आयोजन होंगे। कहीं विशालकाय रावण के पुतले आकर्षण का केंद्र बनेंगे, तो कहीं सामाजिक संदेश देने के लिए अनोखे पुतले जलाए जाएंगे। मध्य प्रदेश के इंदौर में 111 फीट ऊंचे रावण का दहन होगा, जबकि राजस्थान के कोटा में 105 फीट का रावण तैयार किया गया है। वहीं, दिल्ली में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के साथ 30 फीट ऊंचे कॉकरोच का पुतला भी जलाया जाएगा।

दशहरे पर देश के अलग-अलग हिस्सों में सदियों से चली आ रही परंपराएं देखने को मिलती हैं। कुछ जगहों पर रावण दहन होता है, जबकि मैसूर और कुल्लू जैसे शहरों में विजयादशमी अलग अंदाज में मनाई जाती है। आइए जानते हैं देशभर में दशहरे के प्रमुख आयोजन और उनकी खास बातें।

इंदौर में 111 फीट का रावण, भोपाल में 105 फीट ऊंचे पुतले का दहन

मध्य प्रदेश में दशहरे को लेकर कई शहरों में बड़े आयोजन किए जा रहे हैं। इंदौर में 111 फीट ऊंचे रावण का दहन होगा। यहां 250 फीट लंबी लंका और करीब डेढ़ घंटे की आतिशबाजी भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहेगी।

भोपाल के कोलार में 105 फीट ऊंचे रावण का पुतला तैयार किया गया है। रावण के साथ मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले भी बनाए गए हैं। वहीं, उज्जैन में 101 फीट ऊंचे रावण का दहन होगा, जहां करीब 45 मिनट तक आतिशबाजी की तैयारी है।

मंदसौर में 80 फीट ऊंचे रावण के पुतले को खास अंदाज में तैयार किया गया है। इसकी आंखें झपकेंगी, गर्दन घूमेगी और तलवार वाला हाथ भी चलेगा। जबलपुर में 75 फीट और ग्वालियर में 65 फीट ऊंचे रावण का दहन किया जाएगा।

कोटा में 5 हजार किलो का रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद भी विशाल

राजस्थान के कोटा में दशहरा मेले को लेकर तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। यहां 105 फीट ऊंचा रावण का पुतला बनाया गया है, जिसका वजन करीब 5 हजार किलो बताया गया है। इसके अलावा कुंभकर्ण और मेघनाद के 70-70 फीट ऊंचे पुतले भी तैयार किए गए हैं।

आयोजन में आतिशबाजी पर 4 लाख रुपये से ज्यादा खर्च किए जाने की जानकारी है। कार्यक्रम के तहत शाम को गढ़ पैलेस से लक्ष्मीनारायण जी की सवारी निकलेगी, जो दशहरा मैदान पहुंचेगी। इसके बाद रावण दहन का आयोजन किया जाएगा।

दिल्ली में रावण के साथ जलेगा 30 फीट का कॉकरोच

दिल्ली के पीतमपुरा में इस बार दशहरे पर एक अनोखा नजारा देखने को मिलेगा। श्री केशव रामलीला कमेटी ने रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के साथ 30 फीट ऊंचे कॉकरोच का पुतला जलाने की तैयारी की है।

कमेटी के मुताबिक, कॉकरोच के पुतले के जरिए घरों और आसपास के इलाकों में गंदगी खत्म करने का संदेश दिया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य लोगों को साफ-सफाई के प्रति जागरूक करना है। इस तरह रावण दहन के पारंपरिक आयोजन को सामाजिक संदेश से भी जोड़ा गया है।

रायपुर में 101 फीट का रावण, पुतले बनाने की लागत बढ़ी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के WRS मैदान में 101 फीट ऊंचे रावण का दहन होगा। बोरियाखुर्द में रावण के साथ कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले भी जलाए जाएंगे।

पुतले बनाने वाले कारीगरों के मुताबिक, बांस, रंगीन कागज, कपड़े, पेंट और सजावट के सामान की कीमतें बढ़ने से इस साल लागत में करीब 15 से 20 प्रतिशत तक इजाफा हुआ है। कुछ कारीगरों के परिवार दशकों से इस काम से जुड़े हैं और दशहरे से पहले छोटे-बड़े पुतले तैयार करते हैं।

पटना में बारिश से बचाने के लिए स्टील पाइप से बने पुतले

बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान में भी दशहरे का बड़ा आयोजन होगा। यहां 90 फीट ऊंचा रावण, 85 फीट ऊंचा मेघनाद और 80 फीट ऊंचा कुंभकर्ण का पुतला तैयार किया गया है।

बारिश के कारण पुतलों को नुकसान न पहुंचे, इसके लिए निर्माण में स्टील पाइप का इस्तेमाल किया गया है। आयोजन स्थल पर महिलाओं के लिए अलग गैलरी बनाने और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था भी की गई है। आयोजकों ने बच्चों की सुरक्षा के लिए उनकी जेब में नाम, पता और मोबाइल नंबर लिखी पर्ची रखने की अपील की है।

रांची में 80 फीट का रावण, दो मंजिला लंका तैयार

झारखंड की राजधानी रांची के मोराबादी मैदान में 80 फीट ऊंचे रावण का पुतला बनाया गया है। यहां दो मंजिला लंका भी तैयार की गई है। आयोजन में आतिशबाजी की भी व्यवस्था की गई है।

वहीं, अरगोड़ा मैदान में 55 फीट ऊंचे रावण और 50-50 फीट के कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतलों का दहन होगा। इन आयोजनों में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की उम्मीद है।

मध्य प्रदेश के इस गांव में रावण का दहन नहीं, होती है पूजा

जहां देश के ज्यादातर हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की नटेरन तहसील के एक गांव में अलग परंपरा देखने को मिलती है। यहां रावण को ग्राम देवता मानकर 'रावण बाबा' के रूप में पूजा जाता है।

गांव के प्राचीन मंदिर में रावण की करीब 12 फीट लंबी लेटी हुई प्रतिमा स्थापित है। ग्रामीण दशहरे पर पुतला जलाने के बजाय पूजा-अर्चना, रामायण पाठ, भजन और सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं।

मैसूर में देवी चामुंडेश्वरी की विजय का उत्सव

कर्नाटक के मैसूर में दशहरे को 'नाडहब्बा' के नाम से जाना जाता है। यहां विजयादशमी का मुख्य संबंध देवी चामुंडेश्वरी की महिषासुर पर विजय से है।

इस मौके पर प्रसिद्ध जंबू सवारी निकाली जाती है। शोभायात्रा में सजे-धजे हाथी, पारंपरिक झांकियां, लोकनृत्य और संगीत शामिल होते हैं। मैसूर पैलेस को भी रोशनी से सजाया जाता है। यहां उत्तर भारत की तरह रावण का पुतला जलाने के बजाय शाही परंपराओं और देवी की विजय का उत्सव मनाया जाता है।

कुल्लू में सात दिन चलता है दशहरा उत्सव

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरे का उत्सव विजयादशमी से शुरू होकर सात दिनों तक चलता है। ढालपुर मैदान में आसपास के गांवों से देवी-देवताओं की पालकियां और रथ पहुंचते हैं। श्रद्धालु भगवान रघुनाथ के दर्शन करते हैं।

यहां रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले नहीं जलाए जाते। उत्सव के अंतिम दिन ब्यास नदी के किनारे घास और लकड़ियों से बनी संरचना को जलाया जाता है, जिसे प्रतीकात्मक लंका दहन से जोड़ा जाता है।

रावण दहन की परंपरा कितनी पुरानी है?

भारत में रावण दहन की परंपरा लंबे समय से रामलीला और दशहरे के आयोजनों से जुड़ी रही है। इसके इतिहास से जुड़े अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं। वाराणसी की रामलीला परंपरा को तुलसीदास और उनके शिष्यों से जोड़ा जाता है, जबकि 1834 में ब्रिटिश कलाकार जेम्स प्रिन्सेप के एक चित्र में रामनगर में रामलीला आयोजन का ऐतिहासिक दृश्य दर्ज होने का उल्लेख मिलता है।

दुनिया के अन्य हिस्सों में भी प्रतीकात्मक पुतले जलाने की परंपराएं रही हैं। ब्रिटेन में 5 नवंबर को मनाया जाने वाला बोनफायर नाइट इसका एक उदाहरण है, जो 1605 की बारूद साजिश की विफलता की याद से जुड़ा है। हालांकि, विभिन्न देशों में पुतला दहन की परंपराओं की शुरुआत और उनके विकास का इतिहास अलग-अलग है।

दशहरे का संदेश: देशभर में रावण दहन से लेकर देवी की विजय के उत्सव तक, विजयादशमी अलग-अलग परंपराओं और मान्यताओं के साथ मनाई जाती है। इन आयोजनों में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक विरासत की झलक भी दिखाई देती है।

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