धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम पर संतों और वीएचपी ने जताया महाराष्ट्र सरकार का आभार
मुंबई, 24 मार्च (आईएएनएस)। महाराष्ट्र सरकार के "धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम" लागू करने के फैसले का संत समाज और विश्व हिंदू परिषद ने स्वागत करते हुए इसे एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी कदम बताया है। इस निर्णय पर जगतगुरु सूर्याचार्य कृष्णदेवनंद गिरि महाराज, स्वामी श्री भरतानंद सरस्वती महाराज और विश्व हिंदू परिषद ने सरकार के प्रति आभार और बधाई व्यक्त की।
जगतगुरु सूर्याचार्य महाराज ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि यह कानून काफी पहले लागू होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि बीते 15 वर्षों में बड़ी संख्या में लोगों का धर्म परिवर्तन हुआ है, जिसे समय रहते रोका जा सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म के अनुयायी होने के नाते वे इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहेंगे और समाज में जागरूकता फैलाते रहेंगे।
वहीं, स्वामी श्री भरतानंद सरस्वती महाराज ने महाराष्ट्र सरकार के फैसले को ऐतिहासिक और क्रांतिकारी करार दिया। उन्होंने कहा कि यदि यह कानून पहले लागू होता तो आदिवासी और गरीब वर्ग के लोगों को धर्मांतरण से बचाया जा सकता था। उनके अनुसार, इस अधिनियम के लागू होने से अब कमजोर वर्गों को बहकाकर धर्म परिवर्तन कराना आसान नहीं होगा।
उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने भले ही महत्वपूर्ण कदम उठा लिया है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पुलिस और प्रशासन इसे कितने प्रभावी तरीके से लागू करती है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अक्सर कानून तो बन जाते हैं, लेकिन उनका सही तरीके से पालन नहीं हो पाता, इसलिए प्रशासन को इस दिशा में विशेष सतर्कता बरतनी होगी।
संतों और संगठनों ने उम्मीद जताई कि यह अधिनियम समाज में संतुलन और धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखने में सहायक साबित होगा।
'महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026' का उद्देश्य जबरन, धोखाधड़ी, प्रलोभन या विवाह के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण को रोकना है। इस कानून के तहत, धर्म परिवर्तन से पहले 60 दिन का नोटिस अनिवार्य है और दोषियों को 7 साल तक की जेल व 1 लाख से 5 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है।
--आईएएनएस
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