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देश के इस अनोखे मंदिर में जीवित रहते लोग खुद का कर देते हैं पिंडदान, हजारों वर्ष पुरानी है परंपरा

देश के इस अनोखे मंदिर में जीवित रहते लोग खुद का कर देते हैं पिंडदान, हजारों वर्ष पुरानी है परंपरा
देश के इस अनोखे मंदिर में जीवित रहते लोग खुद का कर देते हैं पिंडदान, हजारों वर्ष पुरानी है परंपरा

गयाजी, 25 सितंबर (आईएएनएस)। देश में एक ऐसा भी मंदिर है, जहां जिंदा लोग खुद का पिंडदान कर देते हैं। यह मंदिर बिल्कुल अलग और अनोखा है। आमतौर पर श्राद्ध और पिंडदान मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए किए जाते हैं लेकिन गया में जो जिंदा हैं वे खुद यह अनुष्ठान करते हैं। यह परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है और आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

बिहार में स्थित इस अनोखे मंदिर का नाम जनार्दन मंदिर है। यह गया के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यह मंदिर गया के भस्मकूट पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु जनार्दन स्वरूप में विराजमान हैं। पितृ पक्ष के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। जर्नादन मंदिर इकलौता मंदिर है, जहां लोग मरने से पहले खुद का पिंडदान करते हैं।

इसकी वजह यह है कि जिन लोगों की कोई संतान नहीं है या फिर परिवार में कोई पिंडदान करने वाला नहीं है तो ऐसे लोग मरने से पहले गया के इस अनोखे मंदिर में खुद अपना पिंडदान करते हैं। जो लोग परिवार होते हुए भी वैराग्य या संन्यास ले लेते हैं, वे भी इस मंदिर में अपना पिंडदान करने के लिए आते हैं। हिंदू धर्म में ये मान्यता है कि अगर किसी का पिंडदान और तर्पण नहीं किया जाता है तो उसकी आत्मा भटकती रहती है। आत्मा को शांति नहीं मिलती है। मान्यता है कि गया के जनार्दन मंदिर में भगवान विष्णु खुद पिंड ग्रहण करते हैं। यहां पिंडदान करने से आत्मा को मुक्ति मिलती है।

गयाजी में एक अनोखी मान्यता है यह भी है कि अगर कोई व्यक्ति जीवित रहते हुए अपना श्राद्ध और पिंडदान करता है तो उसकी मृत्यु के बाद उसके परिजनों को यह अनुष्ठान नहीं करना पड़ता है। ऐसा करने से व्यक्ति के सभी पितृ दोष समाप्त हो जाते हैं। मृत्यु के बाद आत्मा को यमलोक या अन्य लोकों में कष्ट नहीं झेलना पड़ता है।

गयाजी में करीब 54 पिंडदेवी और 53 पवित्र स्थल हैं, जहां पितरों का पिंडदान होता है लेकिन जनार्दन मंदिर वेदी पूरी दुनिया में इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां जीवित व्यक्ति अपना ही श्राद्ध करते हैं। ये मंदिर भस्मकूट पर्वत पर मां मंगला गौरी मंदिर के उत्तर में मौजूद है।

आत्मश्राद्ध तीन दिन में पूरा होता है, पहले गया जी तीर्थस्थल आने पर वैष्णव सिद्धि का संकल्प लिया जाता है और पापों का प्रायश्चित किया जाता है। इसके बाद भगवान जनार्दन स्वामी के मंदिर में पूरे विधि विधान के तहत पूजा-अर्चना और जाप होता है। फिर दही और चावल से बने 3 पिंड भगवान को अर्पित किए जाते हैं। खास बात ये है, इसमें तिल का इस्तेमाल नहीं होता जबकि मृतकों को श्राद्ध में तिल जरूरी माना जाता है। पिंड अर्पित करते समय श्रद्धालु भगवान से प्रार्थना करते हैं कि भगवान जीवित रहते हुए मेरा खुद के लिए ये पिंड अर्पित कर रहा हूं, जब मेरी आत्मा इस शरीर से त्याग करेगी, आपके आशीर्वाद से मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो।

--आईएएनएस

एसडी/पीएम

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