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दिल्ली दंगा केस में 12 आरोपी बरी, वीडियो में जाने कोर्ट ने कहा- सिर्फ भीड़ का हिस्सा होना अपराध साबित करने के लिए काफी नहीं

दिल्ली दंगा केस में 12 आरोपी बरी, वीडियो में जाने कोर्ट ने कहा- सिर्फ भीड़ का हिस्सा होना अपराध साबित करने के लिए काफी नहीं

दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में 12 आरोपियों को हत्या, दंगा और डकैती समेत कई गंभीर आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल इस आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती कि वह गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था। अभियोजन पक्ष को प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका और खास आपराधिक कृत्य का ठोस सबूत पेश करना जरूरी है।

25 अगस्त के आदेश में कोर्ट ने क्या कहा

एडिशनल सेशन जज परवीन सिंह ने 25 अगस्त के आदेश में कहा कि गैरकानूनी सभा में शामिल होना अपने आप में हर अपराध के लिए व्यक्तिगत दोष साबित नहीं करता। अदालत के मुताबिक, यदि किसी आरोपी पर कोई खास अपराध करने का आरोप है तो उसके खिलाफ उस अपराध में उसकी व्यक्तिगत भूमिका का प्रमाण होना चाहिए।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का गैरकानूनी सभा के दौरान घातक हथियार से लैस होना उसका व्यक्तिगत कृत्य माना जा सकता है। लेकिन केवल गैरकानूनी सभा का सदस्य होने के आधार पर उस व्यक्ति पर ऐसी आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

12 आरोपियों को मिला संदेह का लाभ

इस मामले में लोकेश सोलंकी, पंकज शर्मा, अंकित चौधरी, प्रिंस, जतिन शर्मा, हिमांशु ठाकुर, विवेक पंचाल, ऋषभ चौधरी, सुमित चौधरी, टिंकू अरोड़ा, संदीप और साहिल आरोपी थे।अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा हत्या, दंगा, आगजनी, डकैती और अन्य संबंधित धाराओं के तहत लगाए गए आरोपों को इन 12 आरोपियों के खिलाफ संदेह से परे साबित नहीं माना। इसके बाद सभी को इन आरोपों में बरी कर दिया गया।हालांकि, अदालत ने हिमांशु ठाकुर को चोरी की संपत्ति रखने के मामले में दोषी पाया। उसके खिलाफ IPC की धारा 411 के तहत अपराध साबित होने की बात कही गई।

भीड़ में शामिल होने और अपराध करने में अंतर

अदालत की टिप्पणी इस मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन को प्रत्येक आरोपी के खिलाफ उन विशेष कृत्यों का प्रमाण देना था, जिनसे संबंधित अपराध हुए। केवल यह साबित करना पर्याप्त नहीं है कि आरोपी उस समय भीड़ में मौजूद था।अदालत ने कहा कि सामूहिक हिंसा के मामलों में भी व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए आरोपी की भूमिका और उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों को अलग-अलग देखना जरूरी है।यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा से जुड़ा है। अदालत के इस फैसले ने एक बार फिर सामूहिक हिंसा के मामलों में व्यक्तिगत भूमिका और अभियोजन के साक्ष्यों की अहमियत को सामने रखा है।

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