राजस्थान के उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पदों का संकट, 60% तक स्टाफ की कमी से शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
प्रदेश में युवाओं का भविष्य तय करने वाले महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। हालात यह हैं कि राजस्थान के सरकारी महाविद्यालयों में शिक्षकों के लगभग 31.66 फीसदी पद खाली पड़े हैं, जबकि विश्वविद्यालयों में यह आंकड़ा और भी गंभीर होकर 65.64 फीसदी तक पहुंच गया है। शिक्षकों की भारी कमी के कारण उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार कई विश्वविद्यालय ऐसे भी हैं, जहां एक भी नियमित प्रोफेसर कार्यरत नहीं है। विश्वविद्यालयों में न केवल शैक्षणिक स्टाफ की कमी है, बल्कि अशैक्षणिक कर्मचारियों के पद भी बड़ी संख्या में रिक्त हैं। ऐसे में प्रशासनिक और शैक्षणिक दोनों तरह के कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
विश्वविद्यालय बने, नियुक्तियां नहीं
प्रदेश में पिछले वर्षों में नए विश्वविद्यालयों की स्थापना तो की गई, लेकिन उनमें नियमित शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं हो पाई। कई विश्वविद्यालय ऐसे हैं, जहां स्थापना के समय से ही स्वीकृत पद खाली पड़े हैं। परिणामस्वरूप अतिथि संकाय या संविदा कर्मियों के भरोसे शिक्षण कार्य चलाया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित शिक्षकों की नियुक्ति न होने से शोध, पाठ्यक्रम विकास और अकादमिक गुणवत्ता प्रभावित होती है। विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर जैसे वरिष्ठ पद खाली होने से शोध निर्देशन और शैक्षणिक नेतृत्व भी कमजोर पड़ रहा है।
राजस्थान विश्वविद्यालय की स्थिति
प्रदेश के सबसे बड़े और प्रमुख विश्वविद्यालय राजस्थान विश्वविद्यालय में भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। यहां शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक मिलाकर करीब 60 फीसदी पद रिक्त बताए जा रहे हैं। इतने बड़े संस्थान में स्टाफ की कमी का सीधा असर छात्रों की पढ़ाई, परीक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यों पर पड़ रहा है।
छात्र संगठनों का कहना है कि पर्याप्त शिक्षकों की कमी के कारण नियमित कक्षाएं नहीं लग पातीं और कई विषयों की पढ़ाई प्रभावित होती है। वहीं, कर्मचारियों की कमी से परिणाम जारी करने और अन्य प्रशासनिक कार्यों में भी देरी होती है।
सरकार पर उठ रहे सवाल
शिक्षा विशेषज्ञों और विपक्षी दलों ने सरकार से रिक्त पदों पर शीघ्र भर्ती की मांग की है। उनका कहना है कि उच्च शिक्षा की मजबूती के बिना प्रदेश का समग्र विकास संभव नहीं है। युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए स्थायी और योग्य शिक्षकों की नियुक्ति आवश्यक है।
हालांकि सरकार की ओर से समय-समय पर भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की बात कही जाती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में अपेक्षित सुधार नजर नहीं आ रहा।
प्रदेश में बढ़ते विश्वविद्यालयों की संख्या के बीच शिक्षकों और कर्मचारियों की कमी गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। यदि समय रहते इन रिक्त पदों को नहीं भरा गया, तो इसका सीधा असर लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ सकता है।

