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NLSIU कन्वेंशन में पहुंचे CJI: 3 महीने पुराने छात्र विरोध के बीच दी बड़ी सीख, असहमति और सम्मान पर कही ये बात

NLSIU कन्वेंशन में पहुंचे CJI: 3 महीने पुराने छात्र विरोध के बीच दी बड़ी सीख, असहमति और सम्मान पर कही ये बात

भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को बेंगलुरु में लॉ स्टूडेंट्स को संबोधित करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के विचारों से असहमत होने का मतलब यह नहीं है कि उसकी गरिमा का सम्मान न किया जाए। किसी भी नतीजे पर पहुंचने या फैसला सुनाने से पहले दूसरे पक्ष को सुनना जरूरी है। उन्होंने कहा कि कानूनी शिक्षा केवल किताबों और अकादमिक ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि छात्रों को अलग-अलग विचारों और नजरियों को समझने की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए।

CJI सूर्यकांत नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU), बेंगलुरु के 34वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में शामिल हुए थे। उनका यह संबोधन ऐसे समय में हुआ, जब देश की कई लॉ यूनिवर्सिटीज में उन्हें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाए जाने को लेकर विरोध की खबरें सामने आई थीं।

CJI सूर्यकांत की स्पीच की 2 बड़ी बातें

1. न्याय के लिए खड़े होने का साहस जरूरी

CJI सूर्यकांत ने कहा कि कानूनी शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ आपराधिक कानून या संवैधानिक कानून के सिद्धांतों को सीखना नहीं है। इसका मकसद उन लोगों के साथ संवाद करना भी है, जिनका दुनिया को देखने का नजरिया हमसे अलग है।

उन्होंने जोर दिया कि कानून और न्यायिक फैसलों की जानकारी होना ही पर्याप्त नहीं है। न्याय के लिए खड़े होने का साहस और उन लोगों की चिंताओं को सुनने की विनम्रता भी जरूरी है, जिनकी आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है।

2. प्रोफेशनल लाइफ में शॉर्टकट से बचें

CJI ने छात्रों को सलाह दी कि वे अपने सिद्धांतों से समझौता न करें और पेशेवर जीवन में शॉर्टकट अपनाने से बचें। उनके मुताबिक, कानूनी पेशे के जरिए अन्याय को दूर करना, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना और संविधान के मूल्यों को बनाए रखना वकीलों के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकती है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्र को कानून के पेशेवरों से केवल अपना काम करने की उम्मीद नहीं है, बल्कि समाज के प्रति योगदान देने की जिम्मेदारी भी है।

CJI सूर्यकांत के निमंत्रण का विरोध क्यों हुआ?

NLSIU में दीक्षांत समारोह को लेकर विवाद उस समय सामने आया, जब यूनिवर्सिटी के 700 से ज्यादा मौजूदा और पूर्व छात्रों ने CJI सूर्यकांत को समारोह में आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने 27 अगस्त को 12 सितंबर को होने वाला समारोह रद्द करने का फैसला लिया था। हालांकि, बाद में इस फैसले को वापस ले लिया गया और दीक्षांत समारोह आयोजित किया गया।

यह विरोध केवल NLSIU तक सीमित नहीं रहा। इससे पहले भी कुछ शैक्षणिक संस्थानों में CJI को मुख्य अतिथि बनाए जाने को लेकर आपत्तियां सामने आई थीं।

CJI के निमंत्रण को लेकर विवाद की टाइमलाइन

1. NALSAR हैदराबाद में छात्रों ने पत्र लिखा

हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी में करीब 450 छात्रों ने प्रशासन को पत्र लिखकर CJI सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाने के निमंत्रण पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। छात्रों ने CJI की कथित टिप्पणियों और दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से संबंधित कार्यवाही को लेकर सवाल उठाए थे।

विवाद के बीच बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने 2026 के ग्रेजुएट्स के रजिस्ट्रेशन पर रोक लगाने का निर्देश दिया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। CJI सूर्यकांत ने बाद में कहा था कि उन्होंने NALSAR का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था।

2. TISS मुंबई का दीक्षांत समारोह स्थगित हुआ

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) ने 2 अगस्त को होने वाला अपना 86वां दीक्षांत समारोह स्थगित कर दिया था। संस्थान ने अप्रत्याशित परिस्थितियों का हवाला दिया। मीडिया रिपोर्ट्स में CJI की मौजूदगी को लेकर छात्रों के संभावित विरोध की आशंका भी जताई गई थी।

बाद में 22 अगस्त को समारोह आयोजित किया गया, जिसमें डॉ. सीएस प्रमेश मुख्य अतिथि बने।

3. ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में शामिल नहीं हुए CJI

सोनीपत स्थित ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के 25 जुलाई को हुए 15वें दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। हालांकि, वे समारोह में शामिल नहीं हुए। उनकी जगह सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने समारोह की अध्यक्षता की।

CJI की टिप्पणी के बाद चर्चा में आई कॉकरोच जनता पार्टी

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम का ऑनलाइन समूह मई 2026 में CJI सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा में आया था। रिपोर्ट के मुताबिक, इस समूह ने 20 जून से 25 जुलाई तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद समाप्त होने का दावा किया गया।

इस विवाद की पृष्ठभूमि 15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक सुनवाई से जुड़ी बताई जाती है। बेंच वकील संजय दुबे की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के खिलाफ मामला उठाया गया था। याचिकाकर्ता वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा प्राप्त करना चाहते थे।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता के दर्जे के महत्व पर चर्चा हुई। इसी दौरान CJI सूर्यकांत ने कथित तौर पर कहा था कि कई युवा वकीलों को पेशे में रोजगार नहीं मिल रहा है और कुछ सोशल मीडिया तथा RTI एक्टिविज्म की ओर जा रहे हैं। उन्होंने कुछ वकीलों की डिग्रियों पर भी संदेह जताया था। उनकी इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देखने को मिली और CJP चर्चा में आ गई।

CJI के संदेश पर क्यों हो रही है चर्चा?

CJI सूर्यकांत का ताजा संबोधन कानून के छात्रों के लिए सम्मान, निष्पक्षता, सुनने की क्षमता और पेशेवर ईमानदारी के महत्व पर केंद्रित रहा। वहीं, उनके निमंत्रण को लेकर अलग-अलग संस्थानों में हुए विरोध ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति और संस्थागत संवाद को लेकर बहस को भी सामने ला दिया है।उनके संदेश का मूल विचार यही था कि असहमति लोकतांत्रिक और कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन असहमत होते समय भी दूसरे व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करना जरूरी है।

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