Samachar Nama
×

यादों में वनराज भाटिया : सिनेमा जगत को लीक से हटकर संगीत देने वाले संगीतकार, विज्ञापन में भी छोड़ी खास छाप

मुंबई, 30 मई (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने लोकप्रियता की दौड़ से अलग रहकर अपने काम के दम पर एक ऐसी पहचान बनाई जो कभी पुरानी नहीं हो सकती। ऐसे ही विरले संगीतकारों में वनराज भाटिया का नाम लिया जाता है। उन्होंने भारतीय समानांतर सिनेमा को अपनी धुनों से एक अलग संवेदनशीलता और गहराई दी। फिल्मों, टेलीविजन धारावाहिकों और विज्ञापनों के लिए तैयार किए गए उनके संगीत ने उन्हें भारतीय संगीत जगत का खास बना दिया।
यादों में वनराज भाटिया : सिनेमा जगत को लीक से हटकर संगीत देने वाले संगीतकार, विज्ञापन में भी छोड़ी खास छाप

मुंबई, 30 मई (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने लोकप्रियता की दौड़ से अलग रहकर अपने काम के दम पर एक ऐसी पहचान बनाई जो कभी पुरानी नहीं हो सकती। ऐसे ही विरले संगीतकारों में वनराज भाटिया का नाम लिया जाता है। उन्होंने भारतीय समानांतर सिनेमा को अपनी धुनों से एक अलग संवेदनशीलता और गहराई दी। फिल्मों, टेलीविजन धारावाहिकों और विज्ञापनों के लिए तैयार किए गए उनके संगीत ने उन्हें भारतीय संगीत जगत का खास बना दिया।

31 मई 1927 को मुंबई में जन्मे वनराज भाटिया ने संगीत की शिक्षा पश्चिमी शास्त्रीय परंपरा में प्राप्त की थी। उन्होंने लंदन की रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक से ट्रेनिंग लिया और गोल्ड मेडल भी प्राप्त किया। हालांकि, पश्चिमी संगीत की मजबूत समझ होने के बावजूद उन्होंने भारतीय संवेदनाओं और आधुनिक संगीत शैली का ऐसा संगम तैयार किया, जिसने उन्हें अन्य संगीतकारों से अलग पहचान दिलाई।

हिंदी फिल्मों में उनका सफर साल 1970 के दशक में शुरू हुआ। निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म 'अंकुर' के साथ उन्होंने फिल्म संगीत की दुनिया में कदम रखा। इसके बाद दोनों की जोड़ी ने भारतीय समानांतर सिनेमा को कई यादगार फिल्में दीं। 'निशांत', 'मंथन', 'भूमिका', 'जुनून', 'कलयुग', 'मंडी', 'त्रिकाल', 'सूरज का सातवां घोड़ा' और 'सरदारी बेगम' जैसी फिल्मों में उनका संगीत कहानी का अभिन्न हिस्सा बनकर उभरा। उनकी धुनें केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थीं, बल्कि वे किरदारों की भावनाओं और फिल्म की संवेदनशीलता को भी गहराई से व्यक्त करती थीं।

वनराज भाटिया की खासियत यह थी कि वह फिल्मों की जरूरत के अनुसार संगीत तैयार करते थे। यही वजह थी कि उनका संगीत पारंपरिक बॉलीवुड शैली से अलग होते हुए भी दर्शकों के मन को छू जाता था। फिल्म 'भूमिका' का गीत "तुम्हारे बिना जी न लगे घर में" आज भी संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है।

फिल्मों के अलावा उन्होंने टेलीविजन की दुनिया में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। 'भारत एक खोज' और 'तमस' जैसे चर्चित धारावाहिकों के लिए तैयार किया गया उनका संगीत आज भी याद किया जाता है। विशेष रूप से 'तमस' के लिए किए गए उनके काम को काफी सराहना मिली और उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस संगीत ने कहानी की गंभीरता और भावनात्मक प्रभाव को और अधिक मजबूत बनाया।

वनराज भाटिया केवल फिल्मों और धारावाहिकों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने विज्ञापन जगत में भी असाधारण सफलता हासिल की। बताया जाता है कि उन्होंने अपने लंबे करियर में करीब सात हजार विज्ञापन जिंगल्स तैयार किए। उस दौर में जब विज्ञापन संगीत को विशेष महत्व नहीं दिया जाता था, तब उन्होंने इसे भी रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बना दिया।

उनकी प्रतिभा का दायरा आध्यात्मिक संगीत तक भी फैला हुआ था। उन्होंने भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक ग्रंथों से प्रेरित कई म्यूजिक प्रोजेक्ट्स पर काम किया। संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 1989 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2012 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

करीब पांच दशकों से अधिक लंबे करियर में वनराज भाटिया ने भारतीय संगीत को नई दिशा दी। समानांतर सिनेमा के इतिहास में लीक से हटकर संगीत रचने वाले और अपनी कला से फिल्मों, टीवी और विज्ञापन जगत में अमिट छाप छोड़ने वाले संगीतकार ने 7 मई 2021 को 93 वर्ष की आयु में दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

--आईएएनएस

एमटी/पीएम

Share this story

Tags