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चित्तौड़गढ़ बीजेपी में मंडल अध्यक्ष नियुक्ति के बाद खेमेबाजी जारी, सीपी जोशी गुट नाराज

चित्तौड़गढ़ बीजेपी में मंडल अध्यक्ष नियुक्ति के बाद खेमेबाजी जारी, सीपी जोशी गुट नाराज

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में बीजेपी के भीतर जारी उठापटक थमने का नाम नहीं ले रही है। हाल ही में किए गए मंडल अध्यक्षों की नियुक्तियों के बाद पार्टी के अंदर की खेमेबाजी और असंतोष फिर से सुर्खियों में आ गया है।

सूत्रों के अनुसार, पार्टी के असंतुष्ट धड़े ने 29 जनवरी तक अल्टीमेटम दिया था, लेकिन प्रदेश नेतृत्व की चुप्पी और कोई ठोस कदम न उठाने के कारण नाराजगी और बढ़ गई। पार्टी के अंदर दो प्रमुख गुट सामने हैं। एक तरफ विधायक चन्द्रभान सिंह आक्या और जिलाध्यक्ष रतन लाल गाडरी के समर्थक, और दूसरी तरफ पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और सांसद सीपी जोशी का नाराज गुट।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक इस मुद्दे को सुलझाने के लिए 3 से 4 बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका। विवाद का केंद्र 6 मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति रही है। सीपी जोशी गुट के कार्यकर्ताओं का आरोप है कि नियुक्तियों में निर्धारित मापदंडों को दरकिनार कर 6 में से 5 मंडल अध्यक्ष चन्द्रभान गुट के समर्थकों को नियुक्त किया गया है।

गुटों के बीच खेमेबाजी का असर स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं और कार्यशैली पर भी दिखाई दे रहा है। एक वरिष्ठ पार्टी सूत्र ने बताया कि यह स्थिति आगामी चुनाव और संगठन की मजबूती के लिए भी चुनौती बन सकती है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर मापदंड और निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह असंतोष और विद्रोह को और हवा देगा।

सत्ताधारी गुट का कहना है कि नियुक्तियां सभी आवश्यक मानकों और संगठन की प्राथमिकताओं के आधार पर की गई हैं। वहीं, नाराज गुट का आरोप है कि यह केवल राजनीतिक दबाव और व्यक्तिगत समीकरणों के तहत किया गया है। इस तरह का विवाद पार्टी की स्थानीय कार्यकारिता और संगठनात्मक एकता को प्रभावित कर सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि चित्तौड़गढ़ जैसी राजनीतिक रूप से संवेदनशील जगहों पर संगठनात्मक खेमेबाजी का असर चुनाव और जनप्रतिनिधियों के समर्थक आधार पर भी पड़ सकता है। ऐसे मामलों में पार्टी नेतृत्व की सक्रिय भूमिका जरूरी होती है, ताकि विवाद के कारण पार्टी की छवि और कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित न हो।

पार्टी कार्यकर्ता और स्थानीय नेताओं का कहना है कि अगले कुछ दिनों में प्रदेश नेतृत्व को मध्यस्थता कर इस विवाद का समाधान करना होगा। वरना, आगामी चुनावों में इस तरह की खेमेबाजी का प्रत्यक्ष असर मतदाताओं और चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है।

इस पूरे विवाद ने यह साफ कर दिया है कि चित्तौड़गढ़ में बीजेपी संगठन के अंदर खेमेबाजी और निजी समीकरण अभी भी राजनीतिक मजबूती और निर्णय लेने में बाधा बन रहे हैं। यदि जल्द समाधान नहीं हुआ, तो यह स्थिति पार्टी के लिए स्थानीय चुनावों और संगठनात्मक नियंत्रण में चुनौती बन सकती है।

इस प्रकार, चित्तौड़गढ़ बीजेपी में मंडल अध्यक्ष नियुक्तियों के बाद चल रही खेमेबाजी और गुटबाजी अब भी पार्टी के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं की निगाहें अब प्रदेश नेतृत्व और मध्यस्थता की ओर टिकी हैं, ताकि संगठन को स्थिर और निष्पक्ष बनाए रखा जा सके।

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