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चिल्का झील में शुरू हुई डॉल्फिन गणना, 18 टीमें तीन दिन तक करेंगी सर्वे

पुरी, 21 जनवरी (आईएएनएस)। चिल्का झील में डॉल्फिन जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह गणना ओडिशा के सतपड़ा क्षेत्र से आरंभ हुई है। चिल्का झील एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है और सर्दियों के मौसम में प्रवासी पक्षियों के लिए जानी जाती है। अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण चिल्का को 1981 में रामसर कन्वेंशन के तहत 'अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि' का दर्जा मिला था। यह भारत की पहली ऐसी वेटलैंड थी जिसे यह दर्जा मिला।
चिल्का झील में शुरू हुई डॉल्फिन गणना, 18 टीमें तीन दिन तक करेंगी सर्वे

पुरी, 21 जनवरी (आईएएनएस)। चिल्का झील में डॉल्फिन जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह गणना ओडिशा के सतपड़ा क्षेत्र से आरंभ हुई है। चिल्का झील एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है और सर्दियों के मौसम में प्रवासी पक्षियों के लिए जानी जाती है। अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण चिल्का को 1981 में रामसर कन्वेंशन के तहत 'अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि' का दर्जा मिला था। यह भारत की पहली ऐसी वेटलैंड थी जिसे यह दर्जा मिला।

चिल्का सिर्फ पर्यावरण की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी बहुत महत्वपूर्ण है। यहां मछली पकड़ना, डॉल्फिन देखना और नेचर ट्रेल्स जैसे आकर्षण पर्यटकों को खूब लुभाते हैं। यह लैगून ओडिशा के पुरी, खुर्दा और गंजाम जिलों में फैला हुआ है। मौसम के अनुसार इसका जल क्षेत्र बदलता रहता है। मानसून के समय यह लगभग 1165 वर्ग किलोमीटर तक फैल जाता है, जबकि गर्मियों में इसका क्षेत्र घटकर करीब 906 वर्ग किलोमीटर रह जाता है।

चिल्का झील लंबे समय से इरावदी डॉल्फिन का प्राकृतिक आवास रही है। इरावदी डॉल्फिन का नाम म्यांमार की अय्यरवाडी नदी के नाम पर पड़ा है। यह एक छोटी प्रजाति की डॉल्फिन है, जो एशिया के तटीय और मुहाना क्षेत्रों में पाई जाती है। ओडिशा के तट पर पाई जाने वाली दस डॉल्फिन प्रजातियों में से इरावदी डॉल्फिन ही एकमात्र ऐसी प्रजाति है जो चिल्का झील के अंदर पाई जाती है। चिल्का के अलावा ये डॉल्फिन गहिरमाथा और भितरकनिका के तटीय इलाकों में भी देखी जाती हैं।

इस साल की डॉल्फिन गणना को लेकर चिल्का वन्यजीव प्रभाग के सहायक वन संरक्षक सौम्य रंजन साहू ने जानकारी दी कि कुल 18 टीमें अलग-अलग सेक्टरों में तैनात की गई हैं। उन्होंने बताया कि गणना शुरू होने से पहले सतपड़ा और बलूगांव में दो स्थानों पर प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए, जहां टीमों को व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। इस गणना में बोट आधारित ट्रांसेक्ट विधि का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें पहले से तय मार्गों पर नावें चलाई जाती हैं और उसी मार्ग को तीन बार दोहराया जाता है ताकि सटीक आंकड़े मिल सकें।

सभी 18 टीमें एक ही समय पर अपने-अपने निर्धारित मार्गों पर रवाना हुईं। टीमों को हैंडहेल्ड जीपीएस, रेंज फाइंडर, दूरबीन, कैमरे और डेटा रिकॉर्ड करने के लिए विशेष फॉर्मेट दिए गए हैं। ज्यादातर टीमें सतपड़ा क्षेत्र से शुरू हुईं, जबकि एक टीम दूसरे स्थान से रवाना हुई। पहले दिन का सर्वे पूरा हो चुका है और अगले दो दिन यह प्रक्रिया जारी रहेगी। उसके बाद सभी आंकड़ों का विश्लेषण किया जाएगा। पिछले साल इरावदी डॉल्फिन के साथ-साथ हंपबैक डॉल्फिन भी देखी गई थीं। कभी-कभी अन्य प्रजातियां भी दिखाई देती हैं, जो पानी के स्तर और मौसम पर निर्भर करता है।

सौम्य रंजन साहू ने आम लोगों और पर्यटकों से विशेष अपील भी की। उन्होंने कहा कि चिल्का और उसके आसपास सिंगल-यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें। झील के भीतर या किनारे प्लास्टिक कचरा फेंकना पर्यावरण और जलीय जीवों के लिए बेहद नुकसानदायक है। उन्होंने बताया कि पर्यटकों की सुविधा के लिए निर्धारित स्थानों पर डस्टबिन लगाए गए हैं, जहां कचरा डाला जा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब डॉल्फिन दिखाई दें, तो पर्यटक नाव चालकों से उनके पास जाने की जिद न करें। बहुत नजदीक जाने से डॉल्फिन की प्राकृतिक जीवनशैली प्रभावित होती है और यह उनके लिए खतरनाक हो सकता है।

वहीं, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया की प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर साध्वी सिंधुरा ने भी इस सर्वे को लेकर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आज आठ टीमें इस क्षेत्र से निकलीं और सभी टीमें वैज्ञानिक शोध पर आधारित तय मार्गों पर ही सर्वे करती हैं। हर टीम एक मानक फ़ॉर्मेट में डॉल्फिन की गतिविधियों को रिकॉर्ड करती है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य है। यह सर्वे भले ही एक दिन में पूरा हो जाता हो, लेकिन असल में यह एक लंबी अवधि की निगरानी प्रणाली का हिस्सा है, जिससे झील और डॉल्फिन के स्वास्थ्य को समझा जा सके।

साध्वी सिंधुरा ने कहा कि डॉल्फिन की संख्या और उनकी सेहत यह बताती है कि चिल्का झील कितनी सुरक्षित और स्वस्थ है। अगर डॉल्फिन सुरक्षित हैं, तो इसका मतलब है कि झील का पारिस्थितिकी तंत्र भी ठीक है। इससे मछुआरों और पर्यटन से जुड़े लोगों की आजीविका भी जुड़ी हुई है। इसलिए डॉल्फिन की सुरक्षा सिर्फ वन्यजीव संरक्षण का मामला नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है।

--आईएएनएस

पीआईएम/एएस

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