आयुर्वेद में बताई गई इन आदतों से गले को मिलेगा आराम, आवाज होगी मधुर
नई दिल्ली, 3 जनवरी (आईएएनएस)। आवाज हमारी पहचान होती है, जो हमें बाकियों से अलग बनाती है। कुछ आवाजें ऐसी होती हैं जो कानों में मिश्री की तरह घुल जाती हैं, जबकि कुछ बहुत कर्कश होती हैं।
धारणा है कि आवाज का संबंध सिर्फ गले से होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। आयुर्वेद में माना गया है कि आवाज का संबंध गले के साथ-साथ पेट, श्वास नली और मानसिक स्थितियों से भी जुड़ा होता है।
आयुर्वेद में माना गया है कि अगर बार-बार गला बैठ जाता है या गले में आवाज फंस जाती है, तो ये बदलते मौसम का असर नहीं, बल्कि बीमारी का संकेत है। आयुर्वेद में गले और आवाज से जुड़ी परेशानियों को वात और पित्त के असंतुलन से जोड़ा गया है। अगर शरीर में वात और पित्त का असंतुलन रहता है, तो आवाज भारी और बेसुरी हो जाती है। इसके अलावा, हमेशा गले में खिचखिच बनी रहती है।
गले और आवाज से जुड़ी परेशानियों में काफी हद तक रोजमर्रा से जुड़ी आदतें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जैसे जोर से चिल्लाना, ऊंची आवाज में बात करना, ज्यादा ठंडा पानी या कोल्ड ड्रिंक पीना, पेट साफ न रहना और तंबाकू का सेवन करना शामिल है। आयुर्वेद में आवाज को कोमल और गले को 'स्वस्थ' रखने के लिए कई उपाय बताए गए हैं।
पहला, दिन की शुरुआत गर्म पानी से करें और हो सके तो पूरे दिन हल्के गर्म पानी का सेवन करें। गर्म पानी के सेवन से गले में सूजन या संक्रमण का खतरा कम रहता है। सुबह का समय गले के लिए बहुत सेंसिटिव होता है और ऐसे में सुबह के समय गले पर जोर न दें और लंबे समय तक फोन पर बात करने से भी बचें। ये आदतें गले को रिलैक्स करने में मदद करेंगी।
दूसरा, श्वास से जुड़े अभ्यास करें। ये पेट से लेकर गले तक के लिए लाभकारी हैं। इसके लिए डायाफ्रामिक श्वास अभ्यास, पर्ड-लिप ब्रीदिंग, कपालभाति और भस्त्रिका कर सकते हैं। ये सभी अभ्यास मस्तिष्क में भी ऑक्सीजन के प्रसार को बढ़ाते हैं और रक्त संचार भी बेहतर तरीके से होता है।
तीसरा, कुछ घरेलू उपाय हैं, जिन्हें रोजाना अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं। इसके लिए सुबह वक्त शहद का सेवन करें, गुनगुने दूध में हल्दी लेकर रात के समय पीएं और अगर खांसी की समस्या है तो जोर से खांसने से बचें और मुलेठी का सेवन करें। मुलेठी गले के लिए संजीवनी की तरह काम करती है।
--आईएएनएस
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