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ब्लड कैंसर का जल्दी पता लगा सकेगी एआई से आधारित नई तकनीक

नई दिल्ली, 26 मई (आईएएनएस)। ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की पहचान अगर कुछ ही समय में, कम मानवीय हस्तक्षेप और ज्यादा सटीकता के साथ हो सके तो इलाज की सफलता की संभावना कई गुना बढ़ सकती है। इसी दिशा में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान ने एआई-सक्षम ऑटोफोकस माइक्रोस्कोपी तकनीक विकसित की है।
ब्लड कैंसर का जल्दी पता लगा सकेगी एआई से आधारित नई तकनीक

नई दिल्ली, 26 मई (आईएएनएस)। ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की पहचान अगर कुछ ही समय में, कम मानवीय हस्तक्षेप और ज्यादा सटीकता के साथ हो सके तो इलाज की सफलता की संभावना कई गुना बढ़ सकती है। इसी दिशा में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान ने एआई-सक्षम ऑटोफोकस माइक्रोस्कोपी तकनीक विकसित की है।

यह तकनीक एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया यानी ब्लड कैंसर और मलेरिया की सटीक पहचान करने में सफल रही है। इस तकनीक को पेटेंट भी मिला है। शोध टीम ने संस्थान के इनक्यूबेशन सेंटर में विकसित स्टार्टअप ग्लोविस्टा इंस्ट्रुमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से यह तकनीक तैयार की है। दरअसल, स्वास्थ्य सेवाओं में माइक्रोस्कोपी तकनीक का उपयोग कैंसर, मलेरिया, तपेदिक और अन्य रोगों की पहचान के लिए किया जाता है, लेकिन पारंपरिक माइक्रोस्कोपी प्रणाली में फोकस को हाथ से समायोजित करना पड़ता है, जिससे समय अधिक लगता है और त्रुटियों की संभावना भी बढ़ जाती है।

कई बार यही देरी गलत निदान और उपचार में बाधा बनती है। इन चुनौतियों को देखते हुए शोधकर्ताओं ने यह ऑप्टोफ्लूडिक डिजिटल माइक्रोस्कोपी प्लेटफॉर्म विकसित किया है। इसमें डीप लर्निंग आधारित एआई तकनीक को ऑप्टिकल इमेजिंग और स्वचालित गति नियंत्रण प्रणाली के साथ जोड़ा गया है। यह प्रणाली माइक्रोस्कोपिक छवियों का रियल टाइम विश्लेषण करती है और स्वत: फोकस समायोजित कर देती है। इससे जांच प्रक्रिया तेज, सटीक और अधिक विश्वसनीय बन जाती है। केवल 1.20 लाख रुपए की लागत से विकसित इस प्रणाली ने प्रयोगशाला स्तर पर ब्लड कैंसर, मलेरिया और रक्त कोशिका वर्गीकरण से जुड़ी जांचों में सटीक परिणाम दिए हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका लक्ष्य एक ऐसा हैंडहेल्ड उपकरण विकसित करना है, जो महंगे आयातित स्वचालित माइक्रोस्कोपी सिस्टम जैसी क्षमता प्रदान कर सके। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें एआई-संचालित ऑटोफोकस, स्वचालित गति नियंत्रण, क्लाउड-सक्षम शिक्षण और जटिल जैविक नमूनों की उन्नत इमेजिंग जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसके जरिए डिजिटल पैथोलॉजी, पॉइंट-ऑफ-केयर हेल्थ डिवाइस, स्मार्ट लैब ऑटोमेशन और दूरस्थ स्वास्थ्य जांच जैसी सेवाओं को भी नई गति मिल सकती है।

शोध दल में सहायक प्रोफेसर डॉ. ईरु बनोथ, शोध स्नातक डॉ. शेख अहमदसैदुलु, डिजाइन इंजीनियर अमोल लालचंद साल्वे और प्रोडक्ट मैनेजर पद्मनाभन सेल्वाकुमार शामिल हैं।

इस परियोजना को नेशनल रिसर्च फाउंडेशन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और जैव प्रौद्योगिकी विभाग से अनुसंधान अनुदान भी प्राप्त हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार अगला चरण इस प्रणाली के लिए बड़े स्तर पर डेटा तैयार करना और विभिन्न क्षेत्रों में फील्ड ट्रायल करना होगा, ताकि इसे वास्तविक स्वास्थ्य सेवाओं में प्रभावी रूप से इस्तेमाल किया जा सके। ‘मेक इन इंडिया’ पहल के अनुरूप यह तकनीक भारत में स्वदेशी स्वास्थ्य नवाचार को नई पहचान दे सकती है।

--आईएएनएस

जीसीबी/डीकेपी

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