बिहार : नदियां उतर रही हैं, लेकिन बाढ़ का दर्द बरकरार, घर लौटकर फिर जिंदगी बसाने की चुनौती
पटना, 10 सितंबर (आईएएनएस)। बिहार में कई स्थानों पर अब नदियों का पानी धीरे-धीरे उतरने लगा है, लेकिन बाढ़ प्रभावित परिवारों की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। बाढ़ प्रभावित इलाकों के लोग के कई परिवार तंबू-तिरपाल लगाकर खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। गांवों में पानी घुसने के बाद ये लोग घर का जरूरी सामान लेकर सुरक्षित जगह की तलाश में यहां पहुंचे हैं। अब इनके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि पानी उतरने के बाद वे घर लौटेंगे तो वहां मिलेगा क्या और जिंदगी को फिर से कैसे शुरू करेंगे।
मुंगेर के जिला मुख्यालय में पार्क और कलेक्ट्रेट कार्यालय के सामने कई परिवार तंबू-तिरपाल लगाकर खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। छोटे-छोटे तंबुओं में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक दिन-रात गुजार रहे हैं। कई परिवारों के साथ उनके मवेशी भी हैं। ग्रामीणों के लिए पशु सिर्फ जानवर नहीं बल्कि उनकी रोजी-रोटी का बड़ा सहारा हैं। इसलिए घर छोड़ने की मजबूरी के बावजूद वे अपने मवेशियों को साथ लेकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचे हैं। यही कुछ स्थिति पटना के मरीन ड्राइव की है। जहां बाढ़ पीड़ित अपना घर छोड़कर पहुंचे हैं।
मुंगेर के जिला मुख्यालय में रह रहे ग्रामीण मुनेश्वर ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि घर में पानी घुसने के बाद जरूरी सामान लेकर यहां आना पड़ा। अभी तो किसी तरह तंबू में रह रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि पानी उतरने के बाद घर लौटेंगे तो घर की क्या हालत होगी। परिवार को फिर से बसाना आसान नहीं होगा। मरीन ड्राइव पर आसरा लिए एक ग्रामीण ने कहा कि बच्चों की पढ़ाई रुक गई है और घर में रखा सामान भी बर्बाद होने की चिंता है। मवेशियों के लिए चारा जुटाना भी मुश्किल है। पानी उतरने के बाद घर की सफाई, मरम्मत और रोजी-रोटी शुरू करने के लिए मदद की जरूरत पड़ेगी।
तिरपाल के नीचे रहना इन परिवारों के लिए आसान नहीं है। बारिश होने पर तंबू में पानी आने का डर रहता है। तेज हवा में तिरपाल उड़ने की चिंता बनी रहती है। रात में जहरीले जीव-जंतुओं का खतरा भी लोगों को परेशान करता है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए परिस्थितियां और कठिन हैं। खाने-पीने का सामान, कपड़े और बिस्तर सुरक्षित रखना भी चुनौती बना हुआ है। इन बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि हमारी असली चिंता नदी का पानी उतरने के बाद शुरू होगी। जिस घर के आंगन में बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां कीचड़ जमा है। जिस कमरे में अनाज रखा था, वहां पानी और नमी ने सामान खराब कर दिया है। कई घरों की दीवारें कमजोर हो चुकी हैं। फसल बर्बाद हुई है और अब तो मवेशियों के सामने चारे की समस्या है। यानी बाढ़ ने सिर्फ घर नहीं डुबोए, बल्कि परिवारों की आर्थिक रीढ़ को भी प्रभावित किया है।
पानी उतरने के बाद लोगों को घरों की सफाई और मरम्मत के साथ दोबारा रोजी-रोटी शुरू करनी होगी। जिन किसानों की फसल बर्बाद हुई है, उनके सामने अगली फसल के लिए पूंजी जुटाने की चुनौती होगी। मजदूरों के सामने रोजगार का संकट होगा। बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है। बाढ़ के बाद दूषित पानी और जलजमाव से डायरिया, टाइफाइड, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है।
बाढ़ प्रभावित लोगों का कहना है कि नदियों का पानी उतर जाएगा, तंबू धीरे-धीरे हट जाएंगे और लोग अपने घरों की ओर लौटेंगे। लेकिन उनके लिए बाढ़ की कहानी वहीं खत्म नहीं होगी। घर दोबारा खड़ा करना, खेतों को फिर तैयार करना, मवेशियों को बचाना और बच्चों की पढ़ाई को पटरी पर लाना- यह सब उस संघर्ष का हिस्सा होगा, जो पानी उतरने के बाद शुरू होगा। आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, विभिन्न नदियों के जलस्तर में हुई वृद्धि के कारण राज्य के 14 जिलों पटना, भोजपुर, सारण, वैशाली, भागलपुर, बेगूसराय, बक्सर, समस्तीपुर, मुंगेर, कटिहार, लखीसराय, खगड़िया, पूर्णिया एवं अरवल के 84 प्रखण्डों में 514 ग्राम पंचायतों के अन्तर्गत लगभग 40.21 लाख जनसंख्या बाढ़ से प्रभावित हुई है।
--आईएएनएस
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