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भोटे कोशी-रसुवागढ़ी आपदा पर मेघ आले की चेतावनी, ‘विकास मॉडल बदलना होगा, हर नदी को हाइड्रो-डॉलर न समझें’

भोटे कोशी-रसुवागढ़ी आपदा पर मेघ आले की चेतावनी, ‘विकास मॉडल बदलना होगा, हर नदी को हाइड्रो-डॉलर न समझें’
भोटे कोशी-रसुवागढ़ी आपदा पर मेघ आले की चेतावनी, ‘विकास मॉडल बदलना होगा, हर नदी को हाइड्रो-डॉलर न समझें’

काठमांडू, 27 अगस्त (आईएएनएस)। भोटे कोशी-रसुवागढ़ी क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ और तबाही ने हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और नदियों पर तेजी से बन रहे जलविद्युत ढांचे को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संरक्षणवादी और नदी विशेषज्ञ मेघ आले ने इस आपदा को प्राकृतिक घटनाओं और मानवीय गतिविधियों के मिले-जुले प्रभाव का परिणाम बताया है। उनका कहना है कि हिमालय में बढ़ते जोखिमों को देखते हुए नेपाल समेत पूरे क्षेत्र को अपने विकास मॉडल पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।

भोटे कोशी-रसुवागढ़ी घटना पर संरक्षणवादी और नदी विशेषज्ञ मेघ आले ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक चीन के तिब्बत क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों का एक बड़ा हिस्सा नदी में गिरा, जिसके बाद अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हुई। घटना इतनी तेजी से हुई कि संभवतः चीनी अधिकारियों को भी इसे समझने और प्रतिक्रिया देने का पर्याप्त समय नहीं मिला। कुछ ही घंटों में चीन की ओर भी बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा।

आले ने बताया कि भोटे कोशी नदी त्रिशूली नदी प्रणाली का हिस्सा है और यह क्षेत्र तिब्बत जाने वाले राजमार्ग पर रसुवागढ़ी के आसपास स्थित है। भोटे कोशी आगे चलकर गोसाईंकुंड क्षेत्र से आने वाली धाराओं में से एक के साथ मिलती है और इसके बाद त्रिशूली नदी प्रणाली का निर्माण होता है। इसलिए इस क्षेत्र में होने वाली किसी भी बड़ी प्राकृतिक घटना का असर नदी के निचले हिस्सों तक पहुंच सकता है।

अचानक आई बाढ़ के कारणों पर बात करते हुए मेघ आले ने इसे केवल प्राकृतिक आपदा मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि यह प्राकृतिक घटनाओं और मानवीय गतिविधियों का संयुक्त प्रभाव हो सकता है। उनके मुताबिक, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ने हिमालयी क्षेत्र में जोखिम बढ़ाए हैं और इन बदलावों के पीछे मानवीय गतिविधियों की भी भूमिका है।

आले ने विशेष रूप से त्रिशूली-भोटे कोशी नदी कॉरिडोर में बन रहे बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं का उल्लेख किया। उनका कहना है कि नदी घाटियों में बड़े पैमाने पर निर्माण होने से प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में नुकसान का स्तर बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि इस घटना को केवल किसी एक परियोजना से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे व्यापक प्राकृतिक और मानवीय परिस्थितियों के संदर्भ में समझने की जरूरत है।

मेघ आले ने कहा कि इसके लिए सबसे पहले यह पता लगाना जरूरी है कि पहाड़ से बर्फ और चट्टान आखिर क्यों गिरी। वैज्ञानिकों को यह भी जांचना होगा कि वहां किस तरह की बर्फ या चट्टान मौजूद थी और क्या किसी ग्लेशियल झील की भूमिका थी।

आले ने कहा कि वैज्ञानिक अभी घटना के वास्तविक कारणों का अध्ययन कर रहे हैं। जब प्राकृतिक खतरे और मानवीय हस्तक्षेप एक साथ आते हैं तो उसका प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है। यही कारण है कि हिमालयी क्षेत्र में आपदा जोखिम को समझने के लिए केवल मौसम या भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि विकास गतिविधियों को भी साथ में देखना होगा।

मेघ आले ने हिमालयी क्षेत्र में हाल के वर्षों में सामने आई कई घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तराखंड, तीस्ता और नेपाल के पश्चिमी हिस्से में सेती नदी क्षेत्र में आई आपदाएं गंभीर चेतावनी हैं। उनके मुताबिक, इन घटनाओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय हिमालय में बदलते पर्यावरण और बढ़ते जोखिमों के संकेत के तौर पर समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अब यह सोचने का समय है कि इन खतरों को किस तरह कम किया जाए और विकास की मौजूदा अवधारणा में क्या बदलाव किए जाएं। उन्होंने हिंदू-कुश हिमालयी क्षेत्र की नदियों को करोड़ों लोगों की जीवनरेखा बताते हुए कहा कि इन नदियों का महत्व केवल बिजली उत्पादन या आर्थिक संसाधन तक सीमित नहीं है।

आले ने कहा कि यह सोच खतरनाक हो सकती है। अगर विकास के नाम पर किसी देश की सभ्यता, प्रकृति और संस्कृति को नुकसान पहुंचता है तो उसे वास्तविक विकास कैसे माना जा सकता है। उनका कहना है कि जलविद्युत उत्पादन जरूरी हो सकता है, लेकिन हर नदी और हर संभावित मेगावाट का दोहन करना विकास का सही मॉडल नहीं है।

--आईएएनएस

एसएके/पीएम

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