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भारतीय सिनेमा के 'रत्न' सत्यजीत रे को जैकी श्रॉफ ने दी श्रद्धांजलि, तस्वीर साझा कर लिखा भावुक नोट

मुंबई, 2 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं, जो समय की सीमाओं को लांघकर अमर हो चुके हैं। इन्हीं नामों में कालजयी निर्देशक सत्यजीत रे का नाम शुमार है। शनिवार को निर्देशक की जन्मतिथि के मौके पर अभिनेता जैकी श्रॉफ ने उन्हें सोशल मीडिया के जरिए श्रद्धांजलि अर्पित की।
भारतीय सिनेमा के 'रत्न' सत्यजीत रे को जैकी श्रॉफ ने दी श्रद्धांजलि, तस्वीर साझा कर लिखा भावुक नोट

मुंबई, 2 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं, जो समय की सीमाओं को लांघकर अमर हो चुके हैं। इन्हीं नामों में कालजयी निर्देशक सत्यजीत रे का नाम शुमार है। शनिवार को निर्देशक की जन्मतिथि के मौके पर अभिनेता जैकी श्रॉफ ने उन्हें सोशल मीडिया के जरिए श्रद्धांजलि अर्पित की।

जैकी ने इंस्टाग्राम स्टोरीज पर सत्यजीत रे की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर पोस्ट की। इसमें वे कैमरे के पास बैठे हुए हैं।

सत्यजीत रे की फिल्मों में संगीत, पटकथा और निर्देशन का जो तालमेल था, वह आज भी फिल्म जगत के छात्रों के लिए किसी पाठ्यपुस्तक से कम नहीं है। उन्हें भारतीय सिनेमा का एकमात्र निर्देशक माना जाता है जिन्हें मानद ऑस्कर (ऑनररी अकादमी अवार्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट) से सम्मानित किया गया।

सत्यजीत रे के फिल्मी करियर की पहली फिल्म पाथेर पांचाली (1955) थी। यह फिल्म बंगाली लेखक विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास पर आधारित थी। रे इस उपन्यास से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस पर अपनी पहली फिल्म बनाने का फैसला किया। हालांकि इस उपन्यास के पीछे भी अपनी एक कहानी है।

बताया जाता है कि ये कहानी ऐसे ही नहीं बनी। इसने पन्नों में उतरने से पहले 500 पन्नों का बलिदान मांगा था। दरअसल, लेखक विभूतिभूषण बंदोपाध्याय ने फिल्म पाथेर पांचाली लिखने से पहले एक कहानी लिखी थी, लेकिन एक दिन घूमने के दौरान उनकी नजर 8 साल की बच्ची पर पड़ी। बिखरे हुए बाल, चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान। उन्हें लगा कि यही बच्ची उनकी कहानी की नायिका हो सकती है। वे तुरंत घर गए और अपनी पुरानी स्क्रिप्ट के सारे पन्ने फाड़ दिए। फिर, उन्होंने उस बच्ची को अपनी कहानी का केंद्र बनाया। आगे चलकर वही किरदार दुर्गा के नाम से मशहूर हुई, जिसे भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार और अमर पात्रों में गिना जाता है। कहानी तैयार होने के बाद सत्यजीत रे ने इस कहानी को पर्दे पर उतारा, जिसे पूरी दुनिया ने सराहा।

इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर वह सम्मान दिलाया, जिसकी पहले केवल कल्पना की जाती थी। यथार्थवाद और मानवीय संवेदनाओं से भरी उनकी फिल्मों ने दुनिया को दिखाया कि भारतीय कहानियां कितनी प्रभावशाली हो सकती हैं।

--आईएएनएस

एनएस/वीसी

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