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भारत की चुनौतियां अलग हैं, इसलिए समाधान भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए: डॉ. गीता वाणी रायसम

नई दिल्ली, 27 फरवरी (आईएएनएस)। सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर (राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान), नई दिल्ली की निदेशक डॉ. गीता वाणी रायसम ने एक कार्यशाला में अपने संबोधन में संस्थान की भूमिका और भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डाला।
भारत की चुनौतियां अलग हैं, इसलिए समाधान भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए: डॉ. गीता वाणी रायसम

नई दिल्ली, 27 फरवरी (आईएएनएस)। सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर (राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान), नई दिल्ली की निदेशक डॉ. गीता वाणी रायसम ने एक कार्यशाला में अपने संबोधन में संस्थान की भूमिका और भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि दो संस्थानों के विलय से बना यह नया संस्थान आज की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। खासकर विज्ञान संचार और नीति अनुसंधान के क्षेत्र में मजबूत योगदान देने के लिए इसे तैयार किया गया है।

संस्थान पुरानी मजबूत विरासत को आगे बढ़ाते हुए प्रमाण-आधारित नीति निर्माण, गहन नीति अनुसंधान और प्रभावी विज्ञान संचार के माध्यम से देश के लिए सार्थक योगदान देना चाहता है। डॉ. रायसम ने कहा कि नीति अनुसंधान के अलावा संस्थान 15 शोध पत्रिकाएं प्रकाशित करता है। ये सभी पत्रिकाएं डायमंड ओपन एक्सेस मॉडल पर आधारित हैं और ऑनलाइन उपलब्ध हैं। इन पत्रिकाओं का दायरा इंजीनियरिंग, सामग्री विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और अंतर्विषयी क्षेत्रों तक फैला हुआ है। इनमें पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक उत्पाद और बौद्धिक संपदा जैसे विषयों पर विशेष पत्रिकाएं भी शामिल हैं।

उन्होंने आत्मनिर्भर भारत की बात करते हुए कहा कि भारतीय पत्रिकाओं को बढ़ावा देना भी जरूरी है। उन्होंने सभी प्रतिभागियों से अपील की कि वे इन पत्रिकाओं में योगदान दें, चाहे संपादकीय बोर्ड में शामिल होकर, समीक्षक के रूप में काम करके या अपना शोध पत्र जमा करके। उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय में इसकी जानकारी फैलाने की भी गुजारिश की। उनका कहना था कि आत्मनिर्भरता सिर्फ प्रौद्योगिकी तक सीमित नहीं है, बल्कि शोध और ज्ञान प्रसार के पूरे ढांचे को मजबूत करने से जुड़ी है।

यह बातचीत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम पर हुई चर्चा से सीधे जुड़ी हुई है। संस्थान बड़े पैमाने पर नीति अनुसंधान करता है। हालांकि यह खुद नीति बनाने वाला नहीं है, लेकिन प्रमाण-आधारित सबूत प्रदान करता है जो सरकार के फैसलों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। खासकर जब संसाधन सीमित हों और उनका प्रभावी उपयोग जरूरी हो। इसी संदर्भ में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम पर एक अध्ययन किया गया। डॉ. शेव और उनकी टीम ने इस प्रोजेक्ट में अमेरिका, ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान और चीन जैसे देशों के मॉडल की तुलना की। इन देशों से सीखते हुए भारत के लिए उपयुक्त रणनीति सुझाई गई।

डॉ. रायसम ने जोर दिया कि इन मॉडलों को पूरी तरह कॉपी नहीं किया जा सकता। भारत की चुनौतियां अलग हैं, इसलिए समाधान भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए। साथ ही वैश्विक मानकों के अनुसार खुद को परखना होगा। वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में प्रतिस्पर्धा के लिए मानक कमजोर नहीं किए जा सकते, बल्कि भारतीय संदर्भ में उन्हें प्रभावी ढंग से अपनाना और लागू करना होगा।

यह कार्यशाला इसी उद्देश्य से आयोजित की गई है। पहले अध्ययन के नतीजे प्रस्तुत किए जाएंगे, फिर विशेषज्ञों से उनके मूल्यवान सुझाव लिए जाएंगे। केवल अध्ययन काफी नहीं है, विशेषज्ञों की राय जरूरी है। इन चर्चाओं के आधार पर नीति निर्माताओं को सौंपने के लिए एक व्हाइट पेपर तैयार किया जाएगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एक बार की कोशिश नहीं होगी। सेमीकंडक्टर क्षेत्र तेजी से बदल रहा है, नई चुनौतियां और अवसर आते रहते हैं। इसलिए समय-समय पर इसकी समीक्षा और गहन अध्ययन जारी रखा जाएगा ताकि भारत इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी और मजबूत बना रहे।

--आईएएनएस

एमएस/

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