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भाई को पर्वत चढ़ते देख जगा जुनून, मजबूत किए इरादे और मौत को चकमा देकर हिमालय की चोटी पर पहुंची

नई दिल्ली, 22 मई (आईएएनएस)। कितने ही कदम राह की मुश्किलों को भांपते हुए ठिठक कर रुक जाते हैं। कितनी ही आंखें मुश्किल कामों को अंजाम तक पहुंचाने का सपना तो देखती हैं, पर घबराकर बीच में ही खुल जाती हैं, लेकिन एक ऐसा नाम भी है, जिसने हिमाचल के शिखर पर पहुंचने का ख्वाब देखकर कठिन मार्गों से गुजरते हुए मंजिल तक पहुंचने का अनूठा सफर तय किया और एवरेस्ट को फतेह किया। बात हो रही है कि माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला महिला बछेंद्री पाल की।
भाई को पर्वत चढ़ते देख जगा जुनून, मजबूत किए इरादे और मौत को चकमा देकर हिमालय की चोटी पर पहुंची

नई दिल्ली, 22 मई (आईएएनएस)। कितने ही कदम राह की मुश्किलों को भांपते हुए ठिठक कर रुक जाते हैं। कितनी ही आंखें मुश्किल कामों को अंजाम तक पहुंचाने का सपना तो देखती हैं, पर घबराकर बीच में ही खुल जाती हैं, लेकिन एक ऐसा नाम भी है, जिसने हिमाचल के शिखर पर पहुंचने का ख्वाब देखकर कठिन मार्गों से गुजरते हुए मंजिल तक पहुंचने का अनूठा सफर तय किया और एवरेस्ट को फतेह किया। बात हो रही है कि माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला महिला बछेंद्री पाल की।

वैसे तो हर किसी के जीवन में कोई न कोई तारीख मायने रखती है, लेकिन बछेंद्री पाल के लिए 23 मई 1984 की तारीख गर्व से सीना चौड़ा करने वाली होती है। बछेंद्री पाल 23 मई को माउंट एवरेस्ट पर चढ़ीं और दोपहर 1:07 बजे एवरेस्ट की चोटी (8,848 मीटर) पर तिरंगा फहराकर यह उपलब्धि हासिल करने वाली दुनिया की 5वीं और भारत की पहली महिला बनीं।

देखा जाए तो वे पैदायशी पर्वतारोही थीं, क्योंकि उनका जन्म उत्तराखंड के उत्तरकाशी में हुआ। वहीं बचपन बीता। पहाड़ों में रहकर ही पढ़ाई-लिखाई की। जिंदगी एक नई राह पहाड़ों में तलाशती रही। एमए और बीएड के बावजूद उस दौर में वे बेरोजगार थीं। उसके बावजूद पहाड़ से ऊंचा उनका मनोबल और जोश पहुंच चुका था।

उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था, "नौकरी मिलना उस समय इतना आसान नहीं था। इसलिए समय भी मेरे पास था। फॉर्मल ट्रेनिंग बहुत देर से शुरू हुई थी। तब एक पर्वतारोही ब्रिगेडियर ज्ञान सिंह ने हमें पर्वतारोहण के लिए काफी प्रेरित किया। 1981 में मैंने पर्वतारोहण का नया सफर शुरू किया।"

पांच भाई-बहनों में से एक बछेंद्री पाल का परिवार बहुत साधारण था, जो उस समय एक छोटे से गांव में रहता था। वे बताती हैं, "उनके बड़े भाई बचन सिंह पाल बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स में रहे हैं। उनको हमने सबसे पहले पर्वतारोहण करते हुए देखा।" वे यह भी मानती हैं कि भाई से पर्वतारोहण की प्रेरणा उन्हें नहीं मिल पाई, क्योंकि अक्सर पर्वतारोहण को लेकर लोग सोचते हैं कि यह जोखिम भरा है और लड़कियां चुनौतियों का मुकाबला करने के काबिल नहीं।"

हालांकि, पवर्तारोहण से जुड़ने के बाद उनके सामने राह आसान नहीं थी, बल्कि कई समस्याएं सामने खड़ी थीं। इसके बावजूद उनका मानना रहा कि अगर कुछ कर गुजरने का जज्बा मन में हो, तब महिला होने के बावजूद कुछ भी हासिल किया जा सकता है। उन्होंने इंटरव्यू में बताया, "हम लोगों ने साहसिक खेलकूद के लिए एक भागीरथी सेवन सिस्टर ट्रेनिंग सेंटर बनाया था। इसमें काफी प्रैक्टिस होती थी।"

उस समय हिमालय की चोटी को छूने का सपना आंखों में बस चुका था। मेहनत नहीं रुकी और हर दिन उन चुनौतियों से टकराने का टास्क लिया, जो हिमालय के खतरनाक सफर में आने वाली थीं। जब बछेंद्री पाल को मालूम हो चुका था कि वे एवरेस्ट फतह करने के लिए तैयार हैं, तो मजबूत इरादों के साथ अपना आगे का सफर तय कर लिया था।

ट्रेनिंग में अनेक चुनौतियों से निपटना सीख लिया था, लेकिन असली परीक्षा में उनके सामने एक मंजर वो भी आया, जब मौत से सामना हुआ। उन्होंने एक अन्य इंटरव्यू में बताया, "एवरेस्ट पर चढ़ते समय रात में तेज आवाज सुनी थी, तब महसूस हुआ कि वे किसी भारी चीज के नीचे दब चुकी हैं। बाद में अहसास हुआ कि उनका सामना हिमस्खलन से हुआ है, जिसमें वे दब चुकी थीं। मैं सोच रही थी कि ये कैसी मौत है।"

बछेंद्री पाल के पैर कुछ घंटों के लिए ठहर चुके थे। जब सांस लौटी और नया सवेरा हुआ तो एवरेस्ट फतह करने का इरादा और मजबूत हो चुका था। फिर वह पल भी आया, जिसका उन्हें इंतजार था। 23 मई 1984 को उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंड एवरेस्ट को फतह करते हुए और नया इतिहास लिख दिया, जिसे पूरा हिंदुस्तान हमेशा याद रखेगा।

--आईएएनएस

डीसीएच/वीसी

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