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कठपुतली बनने से बेहतर है, अपने किरदार को खुद गढ़ो, युवाओं के लिए जीवन का संदेश देता वीडियो

कठपुतली बनने से बेहतर है, अपने किरदार को खुद गढ़ो, युवाओं के लिए जीवन का संदेश देता वीडियो

आज के तेज़-तर्रार और प्रतिस्पर्धी युग में कई बार लोग दूसरों के दबाव, अपेक्षाओं या प्रभाव में आकर अपने जीवन को ऐसे दिशा देते हैं, जैसे वे किसी और के हाथ की कठपुतली हों। लेकिन हाल ही में सामाजिक और प्रेरक मंचों पर यह विचार सामने आया है कि “किसी के हाथ की कठपुतली बनने से बेहतर है, छोटा ही सही, अपना किरदार खुद बनाओ”। यह संदेश न केवल युवाओं के लिए बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है, जो अपनी पहचान और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार लोग अपने फैसले दूसरों के अनुसार लेने लगते हैं। यह या तो परिवार, समाज, शिक्षा या पेशेवर दबाव के कारण होता है। परिणामस्वरूप, व्यक्ति अपने सपनों और महत्वाकांक्षाओं को नजरअंदाज करता है। ऐसे में यह विचार कि “छोटा ही सही, लेकिन अपना किरदार खुद बनाना”, हमें यह याद दिलाता है कि हमारी जिंदगी हमारी जिम्मेदारी है। चाहे हमारे प्रयास छोटे ही क्यों न हों, लेकिन अगर उन्हें हमने अपने तरीके से चुना और निभाया, तो उनका मूल्य दूसरों की बनाई बड़ी छवि से कहीं अधिक होता है।

सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया ने इस संदेश को और भी प्रासंगिक बना दिया है। आज के समय में कई युवा बड़ी सफलता, प्रसिद्धि और मान्यता के पीछे भागते हैं, लेकिन कई बार वे अपने आत्मसम्मान और पहचान की कीमत पर दूसरों के मार्गदर्शन या अपेक्षाओं के अनुसार अपने निर्णय ले लेते हैं। इस स्थिति में यह कथन हमें याद दिलाता है कि छोटी सफलता जो हमने खुद कमाई हो, वह बड़ी सफलता से ज्यादा सार्थक होती है जो किसी और की योजना के तहत हासिल हुई हो।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि आत्मनिर्णय और स्वतंत्रता का अनुभव व्यक्ति में आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और सृजनात्मकता को बढ़ाता है। जब कोई व्यक्ति अपने किरदार को खुद बनाता है, तो वह केवल अपनी ज़िन्दगी में संतुलन नहीं लाता, बल्कि समाज में भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। उदाहरण के लिए, कई युवा छोटे व्यवसाय, कला, विज्ञान या सामाजिक क्षेत्र में अपने तरीके से काम कर रहे हैं। भले ही उनकी शुरुआत छोटी हो, लेकिन उनके द्वारा अपनाई गई स्वायत्तता और निर्णय लेने की क्षमता उन्हें जीवन में स्थायी सफलता और संतोष देती है।

यह संदेश केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। यह हर उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है जो अपनी पहचान खोते हुए दूसरों के इशारों पर चल रहा है। चाहे व्यक्ति नौकरी में हो, शिक्षा में हो या पारिवारिक जीवन में, अपने निर्णय खुद लेने और अपने छोटे या बड़े प्रयासों को अपनी शर्तों पर जीने की आदत ही उसे सशक्त बनाती है।

अंततः यह कथन यह समझाने का प्रयास करता है कि जीवन में स्वतंत्रता और आत्मसम्मान से बढ़कर कोई उपलब्धि नहीं होती। किसी के हाथ की कठपुतली बनकर जीवन बिताने से बेहतर है कि छोटे स्तर पर ही सही, अपने सपनों, अपने निर्णयों और अपने प्रयासों के साथ खुद की पहचान बनाई जाए। यही असली सफलता है, यही असली संतोष है।

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