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अमृतसर में हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन, शांति और आपसी रिश्‍ते मजबूत करने पर जोर

अमृतसर में हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन, शांति और आपसी रिश्ते मजबूत करने पर जोर
अमृतसर में हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन, शांति और आपसी रिश्‍ते मजबूत करने पर जोर

अमृतसर, 14 अगस्त (आईएएनएस)। अमृतसर में आयोजित 31वें हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान के बीच शांति, आपसी मेलजोल और लोगों के स्तर पर मजबूत रिश्तों की जरूरत पर जोर दिया गया।

सम्मेलन में शिरकत करने आए मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक और बांग्लादेश-भारत-पाकिस्तान पीपुल्स फोरम के वर्किंग प्रेसीडेंट डॉ. सुनील ने कहा कि दोनों देशों के बीच नफरत और तनाव को कम करने के लिए आम लोगों के बीच संवाद और दोस्ती को बढ़ावा देना जरूरी है। युद्ध किसी भी देश की जनता के लिए स्थायी समाधान नहीं है और संघर्ष पर खर्च होने वाले संसाधनों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे क्षेत्रों में लगाया जाना चाहिए।

डॉ. सुनील ने आईएएनएस से बातचीत के दौरान पार्टीशन म्यूजियम में दर्ज विभाजन की दर्दनाक कहानियों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत-पाकिस्तान विभाजन ने आम लोगों को भारी मानवीय त्रासदी झेलने पर मजबूर किया था। इतिहास से यह सीखने की जरूरत है कि युद्ध और हिंसा की सबसे बड़ी कीमत आम परिवारों को चुकानी पड़ती है। ऐसे में दोनों देशों के बीच शांति कायम करने और लोगों के बीच भरोसा बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जाने चाहिए।

उन्होंने कहा कि सम्मेलन में देश के करीब 20 राज्यों से लगभग 400 लोग शामिल हुए हैं और सभी की साझा इच्छा नफरत की दीवारों को तोड़कर शांति और भाईचारे का संदेश आगे बढ़ाना है। भारत और पाकिस्तान को अपने संसाधनों का बड़ा हिस्सा हथियारों और सैन्य तैयारियों के बजाय जनकल्याण के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को प्राथमिकता देने की बात कही।

उन्होंने कहा कि यदि युद्ध और हथियारों पर खर्च होने वाले संसाधनों का उपयोग स्कूलों, अस्पतालों और रोजगार के अवसर पैदा करने में किया जाए तो इससे दोनों देशों के करोड़ों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन का उद्देश्य शांति का संदेश फैलाना और दोनों देशों में मौजूद उन आवाजों को मजबूती देना है, जो आपसी सम्मान और दोस्ती की पक्षधर हैं।

उन्होंने युवाओं की भूमिका का भी उल्लेख करते हुए कहा कि जिस तरह विभिन्न आंदोलनों में नई पीढ़ी ने अपनी आवाज को प्रभावी ढंग से सामने रखा है, उसी तरह भारत और पाकिस्तान में शांति चाहने वाले युवाओं और नागरिकों को भी एकजुट होकर आगे आना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देशों के लोग सड़कों और सामाजिक मंचों पर शांति की आवाज को मजबूत करेंगे और सरकारों को भी जनता की इस इच्छा को समझना होगा।

डॉ. सुनील ने यूरोप में लंबे समय तक चले संघर्षों के बाद सहयोग और क्षेत्रीय एकीकरण की मिसाल का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच भी भविष्य में रिश्तों को नई दिशा दी जा सकती है। उन्होंने बर्लिन की दीवार गिरने और यूरोपीय संघ के गठन का उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास और संस्कृति से जुड़े समाजों के बीच सीमाओं और दुश्मनी से आगे बढ़कर सहयोग की संभावनाएं तलाशनी चाहिए। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों के बीच साझा इतिहास और सांस्कृतिक विरासत है, जिसे दुश्मनी के बजाय आपसी समझ और दोस्ती का आधार बनाया जा सकता है।

वहीं, सम्मेलन में शामिल राज स्मृति ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि आज की पीढ़ी ने भारत-पाकिस्तान विभाजन की भयावहता को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा है। कई युवाओं को विभाजन की त्रासदी के बारे में उतनी जानकारी नहीं है, क्योंकि उनके माता-पिता और परिवार के बड़े सदस्यों ने भी उस दौर की सभी चुनौतियों का अनुभव नहीं किया। पार्टीशन म्यूजियम में विभाजन से जुड़ी दर्दनाक कहानियां देखने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि समाज और देशों को शांति की कितनी जरूरत है। युद्ध में होने वाली पारिवारिक और मानवीय क्षति बेहद पीड़ादायक होती है और इसलिए शांति की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान को पुरानी दुश्मनी और आपसी अविश्वास से बाहर निकलकर शांतिपूर्ण रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। युद्ध से आम जनता को कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलता, बल्कि इसका सबसे अधिक असर परिवारों, युवाओं और समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ता है। आधुनिक हथियारों की आपूर्ति करने वाले देशों को इससे आर्थिक लाभ हो सकता है, लेकिन संघर्ष में शामिल देशों की जनता को महंगाई, असुरक्षा, विस्थापन और जान-माल के नुकसान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

--आईएएनएस

एएसएच/एबीएम

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