अखिलेश यादव की लाल टोपी पर बरसे मौलाना शहाबुद्दीन रजवी, बोले-लाल निशान शैतान का
बरेली, 8 नवंबर (आईएएनएस)। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष शहाबुद्दीन रजवी ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की लाल टोपी को लेकर तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि मजहबी नजरिए से लाल रंग को अच्छा नहीं माना जाता, पैगंबर-ए-इस्लाम को सफेद रंग पसंद था, लेकिन अखिलेश ने अब सफेद टोपी और रूमाल से दूरी बना ली है। वहीं सोनिया गांधी की किताब पर उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर सोनिया रातभर रोई थीं, इससे उनकी इंसाफपसंदी और अल्पसंख्यकों के प्रति हमदर्दी झलकती है।
मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा, "कुछ लोग अखिलेश यादव की लाल टोपी के बारे में चर्चा कर रहे हैं, तो मैं बताऊं कि लाल निशान शैतान का है। लाल निशान को अच्छा नहीं माना जाता और हम मजहबी नुक्ता-ए-नजर से यह बात करते हैं। पैगंबर-ए-इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लाल कपड़े की कोई भी चीज या लाल रंग की कोई भी चीज पसंद नहीं फरमाई। पैगंबर-ए-इस्लाम को सफेद रंग पसंद था। सफेद रंग की कोई भी चीज होती थी, उसे पसंद फरमाते थे।"
सपा प्रमुख को घेरते हुए उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव की टोपी लाल रंग की है, जबकि आज से सात-आठ साल पहले तक वह सफेद टोपी भी कभी-कभी रमजान में एक बार रोजा इफ्तार कराते थे, तो लगा लेते थे। कंधे पर एक रूमाल डाल लेते थे और मुसलमानों के मसीहा बन जाते थे। मगर सात-आठ साल से उन्होंने सफेद रंग की न कभी टोपी लगाई है और न कभी अपने कंधे पर रूमाल डाला है।
मौलाना रजवी ने कहा कि अब वह यह जाहिर करते हैं कि मैं मुसलमानों का मसीहा नहीं हूं। जब था, तब था। अब वह हमेशा अपने सिर पर लाल टोपी पहनते हैं। लाल रंग की टोपी हमेशा वही लगाते हैं। उससे जाहिर होता है कि हमारी पहचान, हमारी शिनाख्त बिल्कुल अलग-थलग है।
उन्होंने कहा कि अगर वह सफेद रंग की टोपी लगा लें, तो आप समझ लीजिए उनके चेहरे की खूबसूरती और बढ़ जाएगी। उनके चेहरे का रंग और निखर जाएगा। मगर उन्होंने अब सफेद टोपी से नफरत कर ली है। अब वह कभी सफेद टोपी नहीं लगाते हैं। कुछ मुसलमान उनके पार्टी कार्यालय गए और उन्होंने सफेद टोपी और शॉल दी, तो उन्होंने हाथ में लेने से भी इनकार कर दिया और किसी दूसरी तरफ बढ़ाकर कह दिया कि इनको टोपी पहना दो, इनको शॉल पहना दो। अब उनकी स्थिति यह हो गई है कि गोया वह सफेद टोपी से नफरत करने लगे हैं।
मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की किताब काफी चर्चा में है। उन्होंने जो किताब लिखी है, एक तरह से उनकी पूरी जीवनी है। किस तरह उनकी राजीव गांधी से शादी हुई और भारत में किस तरह के हालात तथा उतार-चढ़ाव उन्होंने देखे, इंदिरा गांधी की हत्या, फिर उनके पति राजीव गांधी की हत्या और इन हादसों से गुजरने के बाद संसद तक पहुंचना, उसी दौरान 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को गिराए जाने का वाकया, इन तमाम मुद्दों पर उन्होंने तफसील से लिखा है। उन्होंने वे तमाम बातें लिखी हैं, जो उन्होंने अपनी आंखों से देखी हैं।
उन्होंने कहा कि उसी में बाबरी मस्जिद का भी जिक्र है। बाबरी मस्जिद के ताल्लुक से जो कुछ उन्होंने लिखा है, उससे संबंधित एक बात यह है कि आज से लगभग 15 साल पहले एक डेलिगेशन के साथ, उलेमा और दानिश्वरों के साथ, मैं भी सोनिया गांधी से मिला था। उस मौके पर भी उन्होंने इस बात का इजहार किया था कि जब मुझे मालूम हुआ और मैंने देखा कि बाबरी मस्जिद गिराई जा रही है तो रातभर मुझे नींद नहीं आई और मैं रोने लगी थी।
मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि यह बयान और यह लेख बताता है कि उनमें किस तरह इंसाफपसंदी, मानवता और अल्पसंख्यकों के प्रति हमदर्दी का भाव है। इससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह अल्पसंख्यकों के साथ हमदर्दी का इजहार करती हैं और चाहती हैं कि भारत में अमन, सुकून और शांति रहे। किसी तरह का सांप्रदायिक दंगा, फसाद, बवाल या झगड़ा न हो और सभी लोग आपस में मेल-मिलाप तथा मोहब्बत के साथ रहें, अपना कारोबार करें और अपनी जिंदगी गुजारें।
उन्होंने कहा कि जहां तक मैंने सोनिया गांधी को देखा, परखा और उनसे जो बातचीत की है, उससे जाहिर होता है कि वह अल्पसंख्यकों के लिए और उनके मसाइल और मामलात के लिए फिक्रमंद रहती हैं।
--आईएएनएस
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