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अखिल बोडो छात्र संघ ने की शांति समझौते के प्रावधानों को लागू करने की मांग

नई दिल्ली, 24 जून (आईएएनएस) नई दिल्ली में संयुक्त निगरानी समिति (जॉइंट मॉनिटरिंग कमेटी) की बैठक के बाद अखिल बोडो छात्र संघ (एबीएसयू) ने केंद्र और असम सरकार से बोडो शांति समझौता 2020 के प्रमुख प्रावधानों को शीघ्र लागू करने की मांग की है। संगठन ने कहा कि समझौते पर हस्ताक्षर हुए 6 वर्ष से अधिक समय बीत चुके हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण मुद्दे अब भी अधूरे हैं। एबीएसयू, जो 27 जनवरी 2020 को हुए ऐतिहासिक बोडो शांति समझौते का प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता है, ने कहा कि बोडो समाज की मूल आकांक्षा आज भी सम्मानजनक जीवन, विकास की स्वतंत्रता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक संरक्षण और राजनीतिक सशक्तिकरण से जुड़ी हुई है।
अखिल बोडो छात्र संघ ने की शांति समझौते के प्रावधानों को लागू करने की मांग

नई दिल्ली, 24 जून (आईएएनएस) नई दिल्ली में संयुक्त निगरानी समिति (जॉइंट मॉनिटरिंग कमेटी) की बैठक के बाद अखिल बोडो छात्र संघ (एबीएसयू) ने केंद्र और असम सरकार से बोडो शांति समझौता 2020 के प्रमुख प्रावधानों को शीघ्र लागू करने की मांग की है। संगठन ने कहा कि समझौते पर हस्ताक्षर हुए 6 वर्ष से अधिक समय बीत चुके हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण मुद्दे अब भी अधूरे हैं। एबीएसयू, जो 27 जनवरी 2020 को हुए ऐतिहासिक बोडो शांति समझौते का प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता है, ने कहा कि बोडो समाज की मूल आकांक्षा आज भी सम्मानजनक जीवन, विकास की स्वतंत्रता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक संरक्षण और राजनीतिक सशक्तिकरण से जुड़ी हुई है।

संगठन का कहना है कि इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए समझौते के सभी प्रावधानों को लागू करना आवश्यक है। एबीएसयू ने बोडो आंदोलन के दौरान हुए तीन प्रमुख समझौतों का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे लोकतांत्रिक संघर्ष और हजारों लोगों के बलिदान के बाद बोडो क्षेत्र को विशेष प्रशासनिक व्यवस्था मिली। बोडोलैंड स्वायत्त परिषद (बीएसी) समझौता 20 फरवरी 1993, बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) समझौता 10 फरवरी 2003 व बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र (बीटीआर) समझौता 27 जनवरी 2020 में किया गया।

संगठन का कहना है कि बीटीआर समझौते का उद्देश्य क्षेत्र की सीमाओं का विस्तार, शक्तियों और प्रशासनिक अधिकारों में वृद्धि तथा विकास की नई संभावनाओं को सुनिश्चित करना था। एबीएसयू ने बताया कि बीटीआर की सीमा बढ़ाने के लिए गठित आयोग का कार्यकाल 31 मार्च 2025 को समाप्त हो गया। संगठन के अनुसार अब भी 634 गांवों के समावेशन का मुद्दा लंबित है। इनमें राजस्व गांव, उप-गांव, वन गांव और वनाधिकार से जुड़े गांव शामिल हैं।

संगठन ने कहा कि केंद्र और असम सरकार ने बोडोलैंड आंदोलन के दौरान क्षेत्रीय विस्तार और विकास का आश्वासन दिया था। ऐसे में समझौते के इस महत्वपूर्ण हिस्से को और अधिक समय तक लंबित रखना उचित नहीं है।एबीएसयू ने आगामी मानसून सत्र में संविधान (125वां संशोधन) विधेयक पारित करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि यह संशोधन बोडो शांति समझौते के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को लागू करने के लिए आवश्यक है।

संगठन का कहना है कि विधेयक के माध्यम से बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 तक की जा सकेगी। परिषद को अतिरिक्त शक्तियां और प्रशासनिक अधिकार मिलेंगे। दलबदल विरोधी प्रावधान लागू होंगे। परिषद चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग की निगरानी में कराए जा सकेंगे।संविधान के अनुच्छेद 280 में संशोधन के जरिए वित्तीय सशक्तिकरण सुनिश्चित होगा। एबीएसयू ने कहा कि संयुक्त निगरानी समिति की बैठक 1 जून को प्रस्तावित थी, लेकिन इसे चार बार टालने के बाद 23 जून को आयोजित किया गया। संगठन ने इसे उदासीनता का संकेत बताते हुए कहा कि लगातार हो रही देरी से बोडो समाज में असंतोष बढ़ रहा है।

एबीएसयू ने चेतावनी दी कि यदि बोडो शांति समझौते के प्रमुख प्रावधानों को लागू करने में और देरी होती है, तो संगठन को बोडो समाज की भावनाओं के अनुरूप आगे की रणनीति तय करनी पड़ सकती है। संगठन ने कहा कि विकास की स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति उसका मूल उद्देश्य है। वहीं आवश्यकता पड़ने पर संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 के तहत अलग बोडोलैंड राज्य की मांग को फिर से प्रमुखता से उठाया जा सकता है।

एबीएसयू का कहना है कि तीन दशकों से अधिक चले आंदोलन और 5000 से ज्यादा लोगों के बलिदान के बाद हुए समझौते का सम्मान करते हुए केंद्र और असम सरकार को इसके सभी प्रावधानों को समयबद्ध तरीके से लागू करना चाहिए।

--आईएएनएस

जीसीबी/पीएम

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