अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी चार्जर घोटाला: क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
नई दिल्ली, 4 मई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले के आरोपी क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की याचिका पर सुनवाई हुई। यह याचिका भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि के एक अहम प्रावधान, यानी आर्टिकल 17 को चुनौती देने को लेकर दाखिल की गई थी। कोर्ट ने इस मामले में फिलहाल नोटिस जारी कर दिया है और चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है।
इस केस की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच कर रही थी। सुनवाई के दौरान मिशेल की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह तक कह दिया था कि अंतरराष्ट्रीय संधि संसद द्वारा बनाए गए कानून से ऊपर मानी जा सकती है। वकील का कहना था कि यह बात सही नहीं है।
याचिकाकर्ता की मुख्य आपत्ति आर्टिकल 17 पर है। इस प्रावधान में कहा गया है कि जिस अपराध के लिए किसी व्यक्ति का प्रत्यर्पण किया गया है, उससे जुड़े अन्य अपराधों के लिए भी उसे मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है। मिशेल की दलील है कि यह भारत के प्रत्यर्पण कानून की धारा 21 के खिलाफ है, जिसमें साफ कहा गया है कि किसी व्यक्ति पर केवल उन्हीं अपराधों के लिए मुकदमा चल सकता है, जिनके आधार पर उसका प्रत्यर्पण हुआ हो।
इसी वजह से मिशेल ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने न सिर्फ आर्टिकल 17 को सही ठहराया था बल्कि उनकी जेल से रिहाई की मांग भी खारिज कर दी थी।
मिशेल पर आरोप है कि उन्होंने अगस्ता वेस्टलैंड कंपनी के लिए भारत में वीवीआईपी हेलीकॉप्टर डील में बिचौलिए की भूमिका निभाई थी। आरोपों के मुताबिक 2005 में हेलीकॉप्टरों की उड़ान ऊंचाई 6000 मीटर से घटाकर 4500 मीटर कर दी गई थी ताकि कंपनी को फायदा हो सके। इसके बदले में रिश्वत दिए जाने की बात भी सामने आई है। जांच एजेंसियों का कहना है कि इस पूरे सौदे में भारी भ्रष्टाचार हुआ और सरकारी खजाने को बड़ा नुकसान पहुंचाया गया।
सीबीआई के अनुसार, इस डील से देश को करीब 398.21 मिलियन यूरो यानी लगभग 2666 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह सौदा 8 फरवरी 2010 को हुआ था जिसकी कुल कीमत 556.262 मिलियन यूरो थी। वहीं, ईडी का आरोप है कि मिशेल को इस डील से करीब 30 मिलियन यूरो यानी लगभग 225 करोड़ रुपये मिले।
सीबीआई ने इस मामले में 12 मार्च 2013 को केस दर्ज किया था। इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी, 420 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की कई धाराएं शामिल हैं। ईडी ने जून 2016 में चार्जशीट दाखिल कर आरोप लगाया कि मिशेल ने यह रकम हासिल की और उसे अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल किया।
मिशेल को 4 दिसंबर 2018 को दुबई से भारत प्रत्यर्पित किया गया था। यह प्रत्यर्पण 2 सितंबर 2018 के आदेश के तहत हुआ था। भारत लाए जाने के बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में यह दलील दी कि उन्हें सिर्फ कुछ सीमित धाराओं में ही लाया गया है और अब उन पर उससे अलग अपराधों में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
उनका कहना था कि प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 21 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उन अपराधों से अलग मामलों में नहीं घसीटा जा सकता जिनके लिए उसे सौंपा गया है। उन्होंने यह भी कहा कि आर्टिकल 17, संविधान के अनुच्छेद 21, 245 और 253 के खिलाफ है क्योंकि यह संबंधित अपराध के नाम पर दायरा बढ़ा देता है।
हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी ये दलीलें खारिज कर दी थीं। कोर्ट ने कहा था कि भारत और यूएई दोनों संप्रभु देश हैं और उन्होंने आपसी सहमति से यह तय किया है कि प्रत्यर्पित व्यक्ति पर जुड़े हुए अपराधों में भी मुकदमा चल सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह व्यवस्था प्रत्यर्पण अधिनियम के खिलाफ नहीं है बल्कि उसी के अनुरूप है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि मिशेल को जिन अपराधों के लिए लाया गया है, वे सभी एक ही तथ्यात्मक पृष्ठभूमि से जुड़े हैं, इसलिए उन पर मुकदमा चलाना उचित है।
मिशेल ने एक और आवेदन में सीआरपीसी की धारा 436ए के तहत रिहाई की मांग की थी, यह कहते हुए कि वह अधिकतम सजा का समय पहले ही काट चुका है। वहीं, दिल्ली हाईकोर्ट ने यह याचिका भी खारिज कर दी थी।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मिशेल को पहले सीबीआई केस में सुप्रीम कोर्ट से 18 फरवरी 2025 को जमानत मिल चुकी है और बाद में ईडी केस में दिल्ली हाईकोर्ट से 4 मार्च 2025 को बेल मिली थी लेकिन शर्तें पूरी न होने की वजह से वह अभी भी हिरासत में हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस याचिका पर नोटिस जारी किया है और चार हफ्ते में जवाब मांगा है।
--आईएएनएस
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