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पुताई करने वाले मिस्त्री की 10 लाख रुपए कमाई, 'कॉर्पोरेट मजदूरों' के भी उडे होश, एक महिला ने तो पूछा ऐसा सवाल

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सोशल मीडिया पर इन दिनों एक पुताई करने वाले मिस्त्री की कमाई को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। दावा है कि एक पेंटिंग मिस्त्री ने महज कुछ महीनों में करीब 10 लाख रुपये की कमाई कर ली। यह बात सामने आते ही कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों, खासकर युवा प्रोफेशनल्स के बीच खलबली मच गई। इसी चर्चा के बीच एक महिला द्वारा पूछा गया सवाल अब बहस का केंद्र बन गया है।

दरअसल, यह मामला तब चर्चा में आया जब एक सोशल मीडिया पोस्ट वायरल हुई। पोस्ट में बताया गया कि एक कुशल पुताई मिस्त्री बड़े शहरों में घरों और ऑफिसों की पेंटिंग का काम करता है और सीजन के दौरान उसकी मासिक कमाई एक से डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच जाती है। साल भर के काम को जोड़ दिया जाए तो उसकी कुल कमाई 8 से 10 लाख रुपये के आसपास हो जाती है। यह आंकड़ा सामने आते ही लोगों ने इसकी तुलना कॉर्पोरेट कर्मचारियों की सैलरी से करनी शुरू कर दी।

सोशल मीडिया पर कई यूज़र्स ने लिखा कि उन्होंने महंगी डिग्रियां लीं, सालों की पढ़ाई की, लेकिन फिर भी उनकी सालाना सैलरी इस मिस्त्री की कमाई से कम है। कुछ लोगों ने इसे “स्किल बनाम डिग्री” की बहस से जोड़ते हुए कहा कि आज के दौर में हुनर की कीमत कहीं ज्यादा है। वहीं कई कॉर्पोरेट कर्मचारियों ने बढ़ते काम के दबाव, लंबी वर्किंग ऑवर्स और कम सैलरी पर नाराजगी भी जताई।

इसी बीच एक महिला यूज़र द्वारा पूछा गया सवाल तेजी से वायरल हो गया। महिला ने लिखा, “अगर एक पुताई करने वाला मिस्त्री 10 लाख कमा सकता है, तो क्या हम सबने गलत रास्ता चुन लिया?” इस सवाल ने हजारों लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। कुछ ने महिला के सवाल का समर्थन किया, तो कुछ ने कहा कि हर पेशे की अपनी चुनौतियां होती हैं और तुलना करना सही नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बहस समाज में बदलते आर्थिक ढांचे को दर्शाती है। आज कुशल मजदूरी, जैसे पेंटिंग, प्लंबिंग, इलेक्ट्रिशियन और कारपेंटर का काम, तेजी से महंगा और मांग वाला हो गया है। बड़े शहरों में इन सेवाओं की कमी है, जिसके चलते अच्छे कारीगर ऊंची फीस चार्ज कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, कॉर्पोरेट सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से सैलरी ग्रोथ सीमित होती जा रही है।

हालांकि, कुछ लोगों ने यह भी कहा कि मिस्त्री की कमाई सीजन पर निर्भर करती है और इसमें शारीरिक मेहनत, जोखिम और अनिश्चितता भी शामिल होती है। हर महीने इतनी कमाई होना जरूरी नहीं। इसके बावजूद यह चर्चा एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—क्या भारतीय समाज में अब हुनर और मेहनत की नई परिभाषा गढ़ी जा रही है?

फिलहाल, पुताई करने वाले मिस्त्री की 10 लाख की कमाई की यह कहानी सिर्फ एक वायरल खबर नहीं, बल्कि देश में रोजगार, शिक्षा और आय को लेकर बदलती सोच का आईना बन चुकी है।

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