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ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान जाने वाला पानी रोकने की योजना धीमी, 4,963 मेगावॉट के 6 हाइड्रो प्रोजेक्ट अटके

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान जाने वाला पानी रोकने की योजना धीमी, 4,963 मेगावॉट के 6 हाइड्रो प्रोजेक्ट अटके

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की ओर जाने वाले नदियों के पानी का अधिक इस्तेमाल करने और उसे स्टोर करने के लिए जिन जलविद्युत परियोजनाओं में तेजी लाने की कोशिश की गई थी, उनका काम अब धीमा पड़ गया है। करीब 4,963 मेगावॉट की कुल क्षमता वाली छह हाइड्रो पावर परियोजनाएं अलग-अलग कारणों से अटकी हुई हैं। इनमें प्रशासनिक मंजूरियों में देरी, पर्यावरण संबंधी स्वीकृति, मजदूरों के विवाद और प्राकृतिक आपदाओं जैसी बाधाएं शामिल हैं।

सरकार की ओर से इन परियोजनाओं को जल्द पूरा करने पर जोर दिया गया था। इसके बावजूद कई परियोजनाओं में काम अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इनका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर में चिनाब और झेलम जैसी नदियों के पानी का बेहतर इस्तेमाल करना, जल भंडारण की क्षमता बढ़ाना और बिजली उत्पादन करना है।

दो परियोजनाओं के पूरा होने में लग सकते हैं 2 से 3 साल

नेशनल हाइड्रो पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, दो परियोजनाएं लगभग पूरी होने के करीब थीं, लेकिन अंतिम चरण में अटक गईं। अब नई मंजूरियां मिलने के बाद भी इनके पूरा होने में दो से तीन साल का अतिरिक्त समय लग सकता है।

इस देरी से परियोजनाओं की समयसीमा और बिजली उत्पादन शुरू होने की योजना प्रभावित हो सकती है। हालांकि, प्रत्येक परियोजना के लिए अलग-अलग बाधाएं हैं, इसलिए सभी के पूरा होने की समयसीमा एक जैसी नहीं होगी।

सावलकोट परियोजना पर सबकी नजर

इन छह परियोजनाओं में सावलकोट हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसकी प्रस्तावित क्षमता 1,856 मेगावॉट है। लेकिन इस परियोजना से जुड़ा ग्लोबल कंसल्टेंसी टेंडर अचानक रद्द कर दिया गया, जिससे आगे की प्रक्रिया प्रभावित हुई है।

परियोजना की फाइल अब पब्लिक इन्वेस्टमेंट बोर्ड (PIB) और कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) की मंजूरी के इंतजार में है। इन स्वीकृतियों के बाद ही परियोजना के अगले चरणों को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकेगा।

सावलकोट परियोजना पूरी होने पर बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन की संभावना है। लेकिन मंजूरी और निविदा प्रक्रिया में देरी के कारण इसकी प्रगति पर असर पड़ रहा है।

सिंधु जल समझौते के स्थगन के बाद बढ़ा जोर

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित करने का फैसला किया था। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में नदी जल संसाधनों के इस्तेमाल और जलविद्युत क्षमता बढ़ाने से जुड़ी परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया।

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौता वर्ष 1960 में हुआ था। इसके तहत दोनों देशों के बीच सिंधु नदी प्रणाली के पानी के इस्तेमाल से जुड़े प्रावधान निर्धारित किए गए थे। समझौते को स्थगित करने के बाद भारत की ओर से अपने जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर जोर दिया गया है।

हालांकि, किसी नदी के पानी को पूरी तरह रोक देना और जलविद्युत परियोजना के जरिए उसके प्रवाह का इस्तेमाल करना अलग-अलग बातें हैं। जलविद्युत परियोजनाओं में बांध, जलाशय और बिजली उत्पादन की संरचनाओं की क्षमता के अनुसार पानी का प्रबंधन किया जाता है।

प्रशासनिक और पर्यावरणीय अड़चनें बनी चुनौती

इन परियोजनाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में सरकारी मंजूरियों में देरी, पर्यावरण संबंधी प्रक्रियाएं, श्रमिकों से जुड़े विवाद और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां शामिल हैं। जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में निर्माण कार्य मौसम और प्राकृतिक आपदाओं से भी प्रभावित हो सकता है।

करीब 4,963 मेगावॉट की संयुक्त क्षमता वाली इन छह परियोजनाओं का समय पर पूरा होना क्षेत्र की बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन फिलहाल कई परियोजनाओं की प्रगति मंजूरियों और दूसरी व्यावहारिक समस्याओं पर निर्भर है।

आने वाले समय में इन परियोजनाओं को गति देने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा करना, लंबित स्वीकृतियां हासिल करना और निर्माण से जुड़ी बाधाओं को दूर करना जरूरी होगा। तभी इनसे बिजली उत्पादन और जल संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा।

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