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Tulsidas Dohe: तुलसीदासजी के दोहे में कलियुग का सच और उन्नति का मंत्र

Tulsidas Dohe: तुलसीदासजी के दोहे में कलियुग का सच और उन्नति का मंत्र

आपने तुलसीदास जी के कई दोहे पढ़े और सुने होंगे। लेकिन यहां आज हम उनके ऐसे दोहों का छोटा-सा संकलन लेकर आए हैं, जिनमें आज की परिस्थियां दिखाई देती हैं। इनमें कुछ दोहे ऐसे भी हैं, जिनमें जीवन जीने की सीख दी गई है, जो आज के समय में भी पूरी तरह लागू होती है, तो आइए जानते हैं कि कैसे इतने वर्ष पहले तुलसीदास जी द्वारा रचे गए दोहे, आज भी प्रासंगिक हैं...

पंडित और मूर्ख एक समान हो जाते हैं

काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान।तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान।।

भावार्थ: इस दोहे के माध्यम से तुलसीदासजी आम मनुष्य को समझाते हैं कि जब किसी व्यक्ति पर काम यानी कामेच्छा, क्रोध यानी गुस्सा, अहंकार और लालच हावी हो जाता है तो एक पढ़ा-लिखा और समझदार व्यक्ति भी अनपढ़ों के समान व्यवहार करने लगता है। इसलिए मनुष्य को इन अवगुणों से दूर रहना चाहिए।

मीठी वाणी का प्रभाव और परिणाम

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुं ओर । बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।।

भावार्थ: तनावपूर्ण संबंधों और माहौल से बाहर आने का रास्ता बताते हुए तुलसीदास जी कहते हैं कि मीठी वाणी बोलना एक व्यक्ति के लिए हुनर है। क्योंकि मीठे बचन वशीकरण का काम करते हैं। मीठी वाणी से आप किसी को भी अपना बना सकते हैं। इसलिए कठोर वचन छोड़कर मीठा बोलना चाहिए।

धर्म और पाप की जड़ें हैं यहां

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण।।

भावार्थ: गोस्वामी तुलसीदासजी मानव मात्र को यह समझाना चाहते हैं कि मनुष्य को दया करना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि दया ही हर धर्म का मूल यानी जड़ है। जबकि सभी पापों के मूल में अभिमान होता है। अभिमान के आते मनुष्य का विवेक समाप्त हो जाता है और वह पाप के गर्त में गिरता जाता है।

अपने मान का स्वयं रखें ध्यान

आवत ही हरषै नहीं नैनं नहीं सनेह। तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।।

भावार्थ: अपने सम्मान के प्रति सजग रहने की सीख देते हुए तुलसीदास जी कहते हैं, जिस जगह आपके जाने से लोग प्रसन्न नहीं होते हों, जहां लोगों की आंखों में आपके लिए प्रेम या स्नेह ना हो, वहां हमें कभी नहीं जाना चाहिए। फिर चाहे वहां धन की बारिश ही क्यों न हो रही हो।

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