Ramdhari Singh Dinkar Poems: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की अब तक की सबसे मशहूर कविताएं
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ एक भारतीय सर्वश्रेष्ठ हिंदी कवि, लेखक, निबंधकार, देशभक्त और अकादमिक थे, और उनको भारत के महत्वपूर्ण आधुनिक हिंदी कवियों में से एक माना जाता है। भारतीय स्वतंत्रता से पहले के दिनों में लिखी गई उनकी राष्ट्रवादी कविता के परिणामस्वरूप वे विद्रोह के कवि के रूप में उभरे थे एवं उनकी लिखी कविताओं ने वीर रस का संचार किय। और उनकी प्रेरक देशभक्ति रचनाओं के कारण उन्हें राष्ट्रकवि (‘राष्ट्रीय कवि’) के रूप में सम्मानित किया गया। जिस प्रकार रूस के लोगों के लिए पुश्किन लोकप्रिय थे वैसे ही भारतीयों और हिंदी भाषियों के लिए ‘दिनकर’ कविता प्रेमियों से जुड़े हुए हैं।
राम, तुम्हारा नाम
राम, तुम्हारा नाम कंठ में रहे,
हृदय, जो कुछ भेजो, वह सहे,
दुख से त्राण नहीं मांगूं।
मांगूं केवल शक्ति दुख सहने की,
दुर्दिन को भी मान तुम्हारी दया
अकातर ध्यानमग्न रहने की।
देख तुम्हारे मृत्यु दूत को डरूं नहीं,
न्योछावर होने में दुविधा करूं नहीं।
तुम चाहो, दूं वही,
कृपण हो प्राण नहीं मांगूं।
रोटी और आजादी
आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहां जुगाएगा?
मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच तो न खा जाएगा?
आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,
पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।
हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले,
पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले।
इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है?
है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है?
झेलेगा यह बलिदान? भूख की घनी चोट सह पाएगा?
आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा?
है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी,
बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।
पुनर्जन्म
जन्म लेकर दुबारा न जनमो,
तो भीतर की कोठरी काली रहती है।
कागज चाहे जितना भी
चिकना लगाओ,
जिन्दगी की किताब
खाली की खाली रहती है।
शुक्र है कि इसी जीवन में
मैं अनेक बार जनमा
और अनेक बार मरा हूं।
तब भी अगर मैं
ताजा और हरा हूं,तो कारण इसका यह है
कि मेरे हृदय में
राम की खींची हुई
अमृत की रेखा है।
मैंने हरियाली पी है,
पहाड़ों की गरिमा का
ध्यान किया है,
बच्चे मुझे प्यारे रहे हैं
और वामाओं ने राह चलते हुएमुझे प्रेम से देखा है।
पर्वत को देखते-देखते
आदमी का नया जन्म होता है।
और तट पर खड़े ध्यानी को
समुद्र नवजीवन देने में समर्थ है।
नर और नारी
जब एक-दूसरे की दृष्टि में
समाते हैं,
उनका नया जन्म होता है।
पुनर्जन्म प्रेम का पहला अर्थ है।
पुनर्जन्म चाहे जितनी बार हो,
हमेशा जीवित रहने से
हमें डरना भी चाहिए।
दोस्ती, बंधन और लगाव की भी
सीमा होती है।
अपने अतीत के प्रतिहर रोज हमें थोड़ा
मरना भी चाहिए।

