Qateel Shifai Shayari: मशहूर शायर क़तील शिफ़ाई की लिखी वो बेहतरीन शायरियां जिसमे साफ़ छलकता है इश्क
पाकिस्तान के मशहूर शायर क़तील साहब का जन्म भारत में हुआ था. लेकिन बंटवारे में उनका पारिवार रावलपिंडी, पाकिस्तान चला गया. उनका वास्तविक नाम मुहम्मद औरंगज़ेब था. उन्होंने कई गई खूबसूरत गीत लिखे हैं जिन्हें पाकिस्तान और भारत की कई फिल्मों में शामिल किया गया है. कतील शिफाई ने 20 से ज्यादा किताबें लिखीं. ग़ज़ल- 'अपने होठों पर सजाना चाहता हूं', 'परेशां रात सारी है', ‘अपने हाथों की 'किया है प्यार जिसे', 'तुम पूछो और मैं ना बताऊं' जैसी तमाम ग़ज़लें काफी मशहूर हुई हैं. आज हम कविता कोश के सभार से कतील शिफाई की कुछ मशहूर गज़लें और शायरियां ले कर आए हैं...
लिख दिया अपने दर पे किसी ने, इस जगह प्यार करना मना है
प्यार अगर हो भी जाए किसी को, इसका इज़हार करना मना हैउनकी महफ़िल में जब कोई आये, पहले नज़रें वो अपनी झुकाए
वो सनम जो खुदा बन गये हैं, उनका दीदार करना मना हैजाग उठ्ठेंगे तो आहें भरेंगे, हुस्न वालों को रुसवा करेंगे
सो गये हैं जो फ़ुर्क़त के मारे, उनको बेदार करना मना हैहमने की अर्ज़ ऐ बंदा-परवर, क्यूँ सितम ढा रहे हो यह हम पर
बात सुन कर हमारी वो बोले, हमसे तकरार करना मना हैसामने जो खुला है झरोखा, खा न जाना क़तील उसका धोखा
अब भी अपने लिए उस गली में, शौक-ए-दीदार करना मना है.
मंज़िल जो मैं ने पाई तो शशदर भी मैं ही था
वो इस लिए के राह का पत्थर भी मैं ही थाशक हो चला था मुझ को ख़ुद अपनी ही ज़ात पर
झाँका तो अपने ख़ोल के अंदर भी मैं ही थाहोंगे मेरे वजूद के साए अलग अलग
वरना बरून-ए-दर भी पस-ए-दर भी मैं ही थापूछ उस से जो रवाना हुए काट कर मुझे
राह-ए-वफ़ा में शाख़-ए-सनोबर भी मैं ही थाआसूदा जिस क़दर वो हुआ मुझ को ओढ़ कर
कल रात उस के जिस्म की चादर भी मैं ही थामुझ को डरा रही थी ज़माने की हम-सरी
देखा तो अपने क़द के बराबर भी मैं ही थाआईना देखने पे जो नादिम हुआ 'क़तील'
मुल्क-ए-ज़मीर का वो सिकंदर भी मैं ही था.
सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको
जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको.सदियों का रस जगा मेरी रातों में आ गया
मैं एक हसीन शक्स की बातों में आ गया.जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए.गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर
उड़ जाए दुपट्टा तो खनक कर.रुम पूछो और में न बताउ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं.रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोके खाए है
अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए है.
हाथ दिया उसने मेरे हाथ में.
मैं तो वली बन गया एक रात में.इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम
तोहमतें बटती नहीं खैरात में.इश्क़ बुरी शै सही, पर दोस्तो.
दख्ल न दो तुम, मेरी हर बात में.हाथ में कागज़ की लिए छतरियाँ
घर से ना निकला करो बरसात में.रत बढ़ाया उसने न 'क़तील' इसलिए
फर्क था दोनों के खयालात में.
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरहकिसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरहबढ़ा के प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरहसितम तो ये है कि वो भी ना बन सका अपना
कूबूल हमने किये जिसके गम खुशी कि तरहकभी न सोचा था हमने "क़तील" उस के लिये
करेगा हमपे सितम वो भी हर किसी की तरह.
पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइयेपहले मिज़ाज-ए-राहगुज़र जान जाइये
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइयेकुछ कह रही है आपके सीने की धड़कने
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइयेइक धूप सी जमी है निगाहों के आस पास
ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइयेशायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो
आँखों में झाँक कर हमें पहचान जाइये.
वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे
मैं तुझको भूल के ज़िंदा रहूँ ख़ुदा न करेरहेगा साथ तेरा प्यार ज़िन्दगी बनकर
ये और बात मेरी ज़िन्दगी वफ़ा न करेये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में
ख़ुदा किसी से किसी को मगर जुदा न करेसुना है उसको मोहब्बत दुआयें देती है
जो दिल पे चोट तो खाये मगर गिला न करेज़माना देख चुका है परख चुका है उसे
"क़तील" जान से जाये पर इल्तजा न करे.अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझ को...
अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा नसीब अपना बना ले मुझकोमुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी
ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझकोमैं समंदर भी हूँ, मोती भी हूँ, ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझकोतूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी
ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझकोकल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ
जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझकोख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझकोमैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझकोमैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारे
तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझकोतर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम
तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझकोवादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ "क़तील"
शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको.

