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Mustafa Zaidi Shayari: मुस्तफ़ा जैदी के जन्मदिवस पर पढ़ें इनकी लिखी कुछ सबसे चुनिंदा शायरी 

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मुस्तफ़ा ज़ैदी शुरुआती दौर में तेग़ इलाहाबादी के नाम से लिखते थे। 16 अक्टूबर 1930 को इलाहाबाद में जन्मे मुस्तफ़ा 1950 के बाद पाकिस्तान चले गए। ज़ैदी की शायरी में शुरुआत में जोश मलीहाबादी का जोश दिखाई देता है।  उसके बाद उनका झुकाव फ़िराक़ की तरफ़ हुआ। अंतत: उन्होंने ख़ुद अपनी एक राह निकाली। उनकी शायरी का विषय रोज़मर्रा का ज़िंदगी की छोटी- छोटी बातें बनीं, जिनकी हम अकसर अनदेखी करते हैं। वैसे रोमानी, प्रेम और निराशा भी उनकी शायरी के प्रमख तत्व रहे, तो आईये आज आपके लिए पेश है मुस्तफ़ा जैदी के चुनिंदा शेर......

हम अंजुमन में सबकी तरफ़ देखते रहे 
अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला 

अब तो चुभती है हवा बर्फ़ के मैदानों की 
इन दिनों जिस्म के एहसास से जलता था बदन

कच्चे घड़े ने जीत ली नद्दी चढ़ी हुई 
मज़बूत क़श्तियों को किनारा नहीं मिला 

ऐ कि अब भूल गया रंगे-हिना भी तेरा 
ख़त कभी ख़ून से तहरीर हुआ करते थे 

कभी झिड़की से कभी प्यार से समझाते रहे 
हम गई रात पे दिल को लिए बहलाते रहे 

रूह के इस वीराने में तेरी याद ही सब कुछ थी 
आज तो वो भी यूँ गुज़री जैसे ग़रीबों का त्यौहार 

सीने में ख़िज़ां आंखों में बरसात रही है 
इस इश्क़ में हर फ़स्ल की सौग़ात रही है 

ढलेगी रात आएगी सहर आहिस्ता- आहिस्ता 
पियो इन अंखड़ियों के नाम पर आहिस्ता- आहिस्ता 

दिखा देना उसे ज़ख़्मे-जिगर आहिस्ता- आहिस्ता 
समझकर, सोचकर, पहचानकर आहिस्ता- आहिस्ता 

अभी तारों से खेलो चांदनी से दिल बहलाओ 
मिलेगी उसके चेहरे की सहर आहिस्ता-आहिस्ता 

सूफ़ी का ख़ुदा और था शायर का ख़ुदा और 
तुम साथ रहे हो तो करामात रही है 

इतना तो समझ रोज़ के बढ़ते हुए फ़ित्ने 
हम कुछ नहीं बोले तो तिरी बात रही है 

किसी जुल्फ़ को सदा दो, किसी आंख को पुकारो
बड़ी धूप पड़ रही है कोई सायबां नहीं है 

इन्हीं पत्थरों से चलकर अगर आ सको तो आओ 
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है  

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