Maulana Hasrat Mohani Shayari: इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाने वाले शायर हसरत मोहानी के कुछ सबसे बेहतरीन शेर
इंकलाब जिंदाबाद का नारा देने वाले उर्दू के महान शायर हसरत मोहानी का जन्म लगभग 14 अक्टूबर 1978 को भारत के उन्नाव में हुआ था। हसरत मोहानी का पूरा नाम सैय्यद फ़ज़ल–उल–हसन था, इनके पिता का नाम अज़हर हुसैन था जो एक जागीदार थे। हसरत का बचपन ननिहाल में गुजारा हैं , और शुरुआती शिक्षा वही से पूरी की। हसरत मोहानी उर्दू शायर के साथ साथ महान स्वतंत्रता सेनानी भी थे। हिंदुस्तान के लिए पूरा स्वतंत्रता मांगने वाले पहले हसरत मोहानी पहले शख्स थे। इनके काम के लिए हसरत मोहानी को मौलाना का लक़ब दिया गया, तो आईये आज मिलाएँ आपको इनके लिखे कुछ सबसे बेहतरीन शेरों से...
अब वो मिलते भी हैं तो यूँ की कभी,
गोया हमसे कुछ वास्ता न था।
इक जहाँ है जिसका मुश्ताके-जमाल,
सख्त हैरत है, वह क्यों रूपोश है।
इक बार दिखाकर चले जाओ झलक अपनी,
हम जल्वा-ए-पैहम के तलबगार कहाँ है।
एक तुम हो कि वफा तुमसे न होगी, न हुई,
एक हम कि तकाजा न किया है, न करेंगे।
और तो पास मेरे हिज्र में क्या रखा है,
इक तेरे दर्द को पहलू में छुपा रखा है।
कहाँ हम कहाँ वस्ले-जानां की हसरत,
बहुत है उन्हें इक नजर देख लेना।
किस-किस तरह से हमने किया अपना जां निसार,
लेकिन गई न दिल से तेरी बदगुमानियाँ।
कुछ समझ में नहीं आता कि यह क्या है 'हसरत',
उनसे मिलकर भी न इजहारे-तमन्ना करना।
खन्दा-ए-अहले-जहाँ की मुझे परवा क्या थी,
तुम भी हंसते हो मेरे हाल पर, रोना है यही।
गैर की नजरों से बचके, सबकी मर्जी के खिलाफ,
वह तेरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है।
जब शमआ हँसी तब परवाने मासूम शरारत कर बैठे,
छोटा-सा दिल और ये जुर्रअत, शोलों से मुहब्बत कर बैठे।
तुम्हें गैरों से कब फुरसत, हम अपने गम से कब खाली,
चलो बस हो चुका मिलना, न तुम खाली, न हम खाली।

