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Kaif Bhopali  Shayari:मशहूर शायर कैफ़ भोपाली के लिखे कुछ सबसे चुनिंदा शेर

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कैफ़ भोपाली (Kaif Bhopali) उर्दू के मशहूर शायर और नग़्मा-निगार थे. कैफ भोपाली का असली नाम 'ख्वाजा मोहम्मद इदरीस' (Khwaja Mohammad Idris) था. वह 20 फरवरी 1917 को मध्य प्रदेश में पैदा हुए. कैफ़ भोपाली ने बॉलीवुड को कई बेहतरीन गाने दिए. उन्होंने पाकीजा फिल्म का गाना 'चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो' लिखा. इसे मशहूर गायक मोहम्मद रफी (Mohammed Rafi) ने गाया है. इसके अलावा कैफ़ के लिखे गानों को गायक जगजीत सिंह (Jagjit Singh) ने गाया है. 'कौन आएगा यहां, कोई न आया होगा ' को जगजीत सिंह ने गाया है. कैफ़ भोपाली ने अपनी जिंदगी में कई मुशायरों में शिरकत की. कैफ भोपाली की बेटी परवीन कैफ़ (Parveen Kaif) भी अच्छी शायर हैं. वह मुशायरों में शिरकत करती हैं. 24 जुलाई 1991 में कैफ भोपाली का इंतिकाल हुआ, तो आईये आज आपको पढ़ाएं इनके लिखे कुछ सबसे चुनिंदा शेर...

ज़िंदगी शायद इसी का नाम है 
दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ 

एक कमी थी ताज-महल में 
मैं ने तिरी तस्वीर लगा दी 

हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे 
वो फ़लाने से फ़लाने से फ़लाने से मिले 

इधर आ रक़ीब मेरे मैं तुझे गले लगा लूँ 
मिरा इश्क़ बे-मज़ा था तिरी दुश्मनी से पहले 

इक नया ज़ख़्म मिला एक नई उम्र मिली 
जब किसी शहर में कुछ यार पुराने से मिले 

आग का क्या है पल दो पल में लगती है 
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है 

दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले 
हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले 

'कैफ़' परदेस में मत याद करो अपना मकाँ 
अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा 

एक कमी थी ताज-महल में
मैं ने तिरी तस्वीर लगा दी

एक कमी थी ताज-महल में
मैं ने तिरी तस्वीर लगा दी

मुझे मुस्कुरा मुस्कुरा कर न देखो 
मिरे साथ तुम भी हो रुस्वाइयों में 

तुम से मिल कर इमली मीठी लगती है 
तुम से बिछड़ कर शहद भी खारा लगता है 

उस ने ये कह कर फेर दिया ख़त
ख़ून से क्यूँ तहरीर नहीं है

उन से मिल कर और भी कुछ बढ़ गईं
उलझनें फ़िक्रें क़यास-आराइयाँ

मेरे दिल ने देखा है यूँ भी उन को उलझन में
बार बार कमरे में बार बार आँगन में

ये दाढ़ियाँ ये तिलक धारियाँ नहीं चलतीं
हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलतीं

इधर आ रक़ीब मेरे मैं तुझे गले लगा लूँ
मिरा इश्क़ बे-मज़ा था तिरी दुश्मनी से पहले

हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे
वो फ़लाने से फ़लाने से फ़लाने से मिले

इक नया ज़ख़्म मिला एक नई उम्र मिली
जब किसी शहर में कुछ यार पुराने से मिले

दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले
हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले

आग का क्या है पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है

सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हँसता चेहरा एक बहाना लगता है

मत देख कि फिरता हूँ तिरे हिज्र में ज़िंदा
ये पूछ कि जीने में मज़ा है कि नहीं है

'कैफ़' परदेस में मत याद करो अपना मकाँ
अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा

कुछ मोहब्बत को न था चैन से रखना मंज़ूर 
और कुछ उन की इनायात ने जीने न दिया 

 

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