Harivansh Rai Bachchan Poetry: हरिवंशराय बच्चन के कविता संग्रह की सबसे मशहूर और पढ़ी गयी कवितायेँ
हिंदी साहित्य में हरिवंश राय बच्चन का नाम बेहद खास है. उनका नाम आता है तो उनकी कविताएं भी खुद ही जहन में आ जाती हैं. आज उनकी पुण्यतिथि है और ऐसे में उन कविताओं को फिर एक बार दोहराना जरूरी है, जिनसे उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया. छायावादी कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने अपनी दिलकश कविताओं से लोगो का मन आकर्षित और प्रात्साहित करने की पुरजोर कोशिश की है. उनकी कृतियों में हमेशा एक आशा का दीपक जलते हुए नज़र आता है. हिंदी काव्य के समुद्र में से हरिवंश राय बच्चन जी की कुछ चुनिन्दा और ख़ास कविताएं हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे है. ये सभी कविताएँ अलग-अलग विषयों पर आधारित है, पर इन्हें पढ़कर आपका मन प्रफुल्लित जरुर हो जाएगा. तो चलिए पढ़ते है हरिवंश राय बच्चन जी की कविताएँ..
लो दिन बीता, लो रात गई
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा –
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।लो दिन बीता, लो रात गई,
सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा,
डूबा, संध्या आई, छाई,
सौ संध्या-सी वह संध्या थी,
क्यों उठते-उठते सोचा था,
दिन में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई।धीमे-धीमे तारे निकले,
धीरे-धीरे नभ में फैले,
सौ रजनी-सी वह रजनी थी
क्यों संध्या को यह सोचा था,
निशि में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई।चिड़ियाँ चहकीं, कलियाँ महकी,
पूरब से फिर सूरज निकला,
जैसे होती थी सुबह हुई,
क्यों सोते-सोते सोचा था,
होगी प्रातः कुछ बात नई।
लो दिन बीता, लो रात गई,-हरिवंशराय बच्चन
कवि की वासना
कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!सृष्टि के प्रारम्भ में
मैने उषा के गाल चूमे,
बाल रवि के भाग्य वाले
दीप्त भाल विशाल चूमे,प्रथम संध्या के अरुण दृग
चूम कर मैने सुलाए,तारिका-कलि से सुसज्जित
नव निशा के बाल चूमे,वायु के रसमय अधर
पहले सके छू हॉठ मेरे
मृत्तिका की पुतलियॉ से
आज क्या अभिसार मेरा?कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!विगत-बाल्य वसुन्धरा के
उच्च तुंग-उरोज उभरे,
तरु उगे हरिताभ पट धर
काम के ध्वज मत्त फहरे,चपल उच्छृखल करों ने
जो किया उत्पात उस दिन,है हथेली पर लिखा वह,
पढ़ भले ही विश्व हहरे;प्यास वारिधि से बुझाकर
भी रहा अतृप्त हूँ मैं,
कामिनी के कुच-कलश से
आज कैसा प्यार मेरा!कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!इन्द्रधनु पर शीश धरकर
बादलों की सेज सुखकर
सो चुका हूँ नींद भर मैं
चंचला को बाहु में भर,दीप रवि-शशि-तारकों ने
बाहरी कुछ केलि देखी,देख, पर, पाया न कोई
स्वप्न वे सुकुमार सुन्दरजो पलक पर कर निछावर
थी गई मधु यामिनी वह;
यह समाधि बनी हुई है
यह न शयनागार मेरा!कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!आज मिट्टी से घिरा हूँ
पर उमंगें हैं पुरानी,
सोमरस जो पी चुका है
आज उसके हाथ पानी,होठ प्यालों पर झुके तो
थे विवश इसके लिए वे,प्यास का व्रत धार बैठा;
आज है मन, किन्तु मानी;मैं नहीं हूँ देह-धर्मों से
बँधा, जग, जान ले तू,
तन विकृत हो जाए लेकिन
मन सदा अविकार मेरा!कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!निष्परिश्रम छोड़ जिनको
मोह लेता विश्न भर को,
मानवों को, सुर-असुर को,
वृद्ध ब्रह्मा, विष्णु, हर को,भंग कर देता तपस्या
सिद्ध, ऋषि, मुनि सत्तमों कीवे सुमन के बाण मैंने,
ही दिए थे पंचशर को;शक्ति रख कुछ पास अपने
ही दिया यह दान मैंने,
जीत पाएगा इन्हीं से
आज क्या मन मार मेरा!कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!प्राण प्राणों से सकें मिल
किस तरह, दीवार है तन
काल है घड़ियाँ न गिनता,
बेड़ियों का शब्द झन-झन,वेद-लोकाचार प्रहरी
ताकते हर चाल मेरी,बद्ध इस वातावरण में
क्या करे अभिलाष यौवन!अल्पतम इच्छा यहाँ
मेरी बनी बन्दी पड़ी है,
विश्व क्रीड़ास्थल नहीं रे
विश्व कारागार मेरा!कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!थी तृषा जब शीत जल की
खा लिए अंगार मैंने,
चीथड़ों से उस दिवस था
कर लिया श्रृंगार मैंनेराजसी पट पहनने को
जब हुई इच्छा प्रबल थी,चाह-संचय में लुटाया
था भरा भंडार मैंने;वासना जब तीव्रतम थी
बन गया था संयमी मैं,
है रही मेरी क्षुधा ही
सर्वदा आहार मेरा!कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!कल छिड़ी, होगी ख़तम कल
प्रेम की मेरी कहानी,
कौन हूँ मैं, जो रहेगी
विश्व में मेरी निशानी?क्या किया मैंने नही जो
कर चुका संसार अबतक?वृद्ध जग को क्यों अखरती
है क्षणिक मेरी जवानी?मैं छिपाना जानता तो
जग मुझे साधु समझता,
शत्रु मेरा बन गया है
छल-रहित व्यवहार मेरा!कह रहा जग वासनामय
हो रहा उद्गार मेरा!-हरिवंशराय बच्चन

